वॉशिंगटन/तेहरान। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध के 27वें दिन भी शांति की कोई किरण नजर नहीं आ रही है. दोनों देशों के बीच युद्धविराम की बातचीत पूरी तरह से पटरी से उतर चुकी है. राजनयिक गलियारों में इसे ‘मैक्सिमलिस्ट अप्रोच’ (अधिकतम मांग की नीति) कहा जा रहा है, जहाँ कोई भी पक्ष झुकने को तैयार नहीं है.क्यों नहीं निकल रहा समाधान? (विवाद के मुख्य बिंदु)दोनों देशों के बीच की खाई इतनी गहरी है कि मेज पर होने वाली चर्चा केवल आरोपों तक सीमित रह गई है. विवाद के मुख्य चार मोर्चे इस प्रकार हैं:
| मुद्दा | अमेरिका की मांग | ईरान की शर्त |
| परमाणु कार्यक्रम | संवर्धन (Enrichment) पूरी तरह बंद हो और पुराने स्टॉक को नष्ट किया जाए। | परमाणु कार्यक्रम हमारा संप्रभु अधिकार है, हम पीछे नहीं हटेंगे। |
| मिसाइल शक्ति | बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय पाबंदी लगे। | मिसाइलें हमारी रक्षा के लिए हैं, इस पर कोई समझौता नहीं होगा। |
| हार्मुज जलडमरूमध्य | यह अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग है, इसे पूरी तरह खुला रखा जाए। | इस पर हमारा नियंत्रण हो और गुजरने वाले जहाजों से ‘ट्रांजिट फीस’ मिले। |
| क्षेत्रीय प्रभाव | ईरान अपने सहयोगी गुटों (Proxies) को समर्थन देना तुरंत बंद करे। | अमेरिका खाड़ी क्षेत्र से अपने सभी सैन्य ठिकाने हटाए। |
बातचीत में ‘डेडलॉक’ के तीन बड़े कारण
अविश्वास की दीवार: ईरान को ट्रंप प्रशासन के वादों पर भरोसा नहीं है, जबकि अमेरिका का मानना है कि ईरान प्रतिबंधों में ढील का उपयोग अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए करेगा।
हार्मुज का ‘चोक पॉइंट’: दुनिया का 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है. ईरान इसे ‘हथियार’ की तरह इस्तेमाल करना चाहता है, जबकि अमेरिका इसे ‘वैश्विक संपत्ति’ मानता है।
इजरायल फैक्टर: ईरान चाहता है कि अमेरिका, इजरायल को हिजबुल्लाह और अन्य गुटों पर हमले करने से रोके, जिसे वाशिंगटन ने सिरे से खारिज कर दिया है।
भविष्य की राह मुश्किल
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक दोनों पक्ष अपनी ‘अधिकतम मांगों’ से पीछे नहीं हटते, तब तक मध्यस्थ देशों (जैसे ओमान या कतर) की कोशिशें भी नाकाम रहेंगी. फिलहाल, शांति की मेज पर केवल बारूद की गंध है।