नई दिल्ली। नए वित्त वर्ष (2026-27) की शुरुआत के साथ ही आम जनता को महंगाई का एक और झटका लगने वाला है. 1 अप्रैल 2026 से आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (NLEM) में शामिल 1,000 से अधिक जरूरी दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी होने जा रही है. सरकार ने थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के आधार पर दवाओं के दामों में करीब 0.6% की वृद्धि को हरी झंडी दे दी है.
क्यों बढ़ रहे हैं दाम?
राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने यह फैसला वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के उन आंकड़ों के आधार पर लिया है, जिनमें वर्ष 2025 में WPI में 0.64956% की वृद्धि दर्ज की गई है. नियमों के मुताबिक, साल में एक बार सूचीबद्ध दवाओं की कीमतों को समायोजित करने की अनुमति दी जाती है.
कौन सी दवाएं होंगी महंगी?
इस सूची में आपकी रोजमर्रा की जरूरत की लगभग सभी दवाएं शामिल हैं:
- पेरासिटामोल: बुखार और दर्द की सबसे आम दवा
- एंटीबायोटिक्स: एजिथ्रोमाइसिन और सिप्रोफ्लोक्सासिन जैसे संक्रमण रोधी साल्ट।
- सप्लीमेंट्स: विटामिन, मिनरल और एनीमिया (खून की कमी) की दवाएं।
- गंभीर बीमारियां: स्टेरॉयड और कोविड-19 के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं।
फार्मा इंडस्ट्री की चिंता: “बढ़ोतरी पर्याप्त नहीं”
विशेषज्ञों का कहना है कि मध्य पूर्व (Middle East) में जारी तनाव के कारण कच्चे माल (API) की कीमतों में 30-35% का उछाल आया है।
ग्लिसरीन: 64% महंगी हुई।
पैकेजिंग: पीवीसी और एल्युमीनियम फॉयल के दाम 40% तक बढ़ गए हैं।
उद्योग जगत का मानना है कि 0.6% की वृद्धि उनकी लागत के मुकाबले बहुत कम है, जिसे लेकर वे जल्द ही NPPA के सामने अपनी मांग रखेंगे।