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तख्तापलट की कोशिश से ‘सदी के समझौते’ तक: क्या ट्रंप ने ईरान को बना दिया मिडिल ईस्ट का नया पावर सेंटर?

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US-Iran Deal 2026: ईरान को कमजोर करने निकले थे ट्रंप, समझौते के बाद बना दिया मिडिल ईस्ट का सबसे बड़ा खिलाड़ी!

THE NewsBar | वॉशिंगटन/तेहरान। मध्य पूर्व की राजनीति में एक बड़ा मोड़ तब आया जब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने 14 बिंदुओं वाले अंतरिम समझौते (MoU) पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के तहत 60 दिनों के लिए युद्धविराम बढ़ाया गया है, ताकि दोनों देश स्थायी शांति समझौते पर बातचीत कर सकें।

कभी ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने और तेहरान पर अधिकतम दबाव बनाने की बात करने वाले अमेरिका को अब उसी ईरान के साथ समझौता करना पड़ा है। यही वजह है कि कई विशेषज्ञ इसे सिर्फ शांति समझौता नहीं, बल्कि मध्य पूर्व की शक्ति-संतुलन व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव मान रहे हैं।

समझौते में क्या है?

14 सूत्रीय समझौते में दोनों देशों ने सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई रोकने, लेबनान में भी युद्धविराम लागू करने, होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों की आवाजाही बहाल करने और 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते की दिशा में बातचीत करने पर सहमति जताई है। अमेरिका ने ईरान पर लगे कुछ प्रतिबंधों में राहत देने और आर्थिक सहयोग बढ़ाने के संकेत भी दिए हैं।

इजरायल क्यों नाराज?

इजरायल के सुरक्षा और रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता उनकी अपेक्षाओं के बिल्कुल विपरीत है। इजरायली विशेषज्ञ डैनी सिट्रिनोविच ने इसे “रणनीतिक आपदा” करार देते हुए कहा कि जिस ईरानी शासन को कमजोर करने या हटाने के लिए अमेरिका और इजरायल ने मिलकर दबाव बनाया था, अब उसी शासन को वॉशिंगटन ने अंतरराष्ट्रीय वैधता दे दी है।

इजरायल की सबसे बड़ी चिंता यह है कि समझौते में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और उसके क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों पर कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। साथ ही ईरान के परमाणु ढांचे को पूरी तरह खत्म करने का कोई ठोस रोडमैप भी सामने नहीं आया है।

खाड़ी देशों की बढ़ी बेचैनी

सऊदी अरब, यूएई और अन्य खाड़ी देशों में भी इस समझौते को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया है। इन देशों को डर है कि अमेरिका की नई नीति से ईरान का प्रभाव और बढ़ सकता है, जबकि वॉशिंगटन की सुरक्षा गारंटी पहले जैसी मजबूत नहीं रह जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका-ईरान संबंध सामान्य होते हैं तो क्षेत्रीय राजनीति में शक्ति संतुलन बदल सकता है।

क्या ट्रंप ने पीछे हटने का फैसला किया?

कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका को यह समझौता मजबूरी में करना पड़ा। लगातार तनाव के कारण तेल बाजार प्रभावित हो रहे थे, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा था और एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का खतरा बना हुआ था। ऐसे में ट्रंप प्रशासन ने टकराव की बजाय बातचीत का रास्ता चुना।

ईरान को सबसे बड़ा फायदा?

समझौते के बाद ईरान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई वैधता मिलने, तेल निर्यात बढ़ने, जमे हुए फंड्स तक पहुंच मिलने और आर्थिक राहत मिलने की संभावना जताई जा रही है। यही कारण है कि लेबनान और पश्चिम एशिया के कई विश्लेषक इसे ईरान की बड़ी कूटनीतिक जीत बता रहे हैं।

आगे क्या?

हालांकि यह केवल अंतरिम समझौता है। अगले 60 दिनों में परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों की समाप्ति, मिसाइल नीति और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे सबसे कठिन मुद्दों पर बातचीत होगी। यदि वार्ता सफल रही तो यह 1979 की ईरानी क्रांति के बाद अमेरिका-ईरान संबंधों में सबसे बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। लेकिन यदि बातचीत विफल हुई, तो मध्य पूर्व एक बार फिर तनाव और संघर्ष की ओर लौट सकता है।

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