पांढुर्णा में सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन आज | 15 लोगों की जान जा चुकी, सैकड़ों घायल | 600 पुलिसकर्मी, 22 एंबुलेंस और 44 डॉक्टर रहेंगे तैनात
THE NewsBar | शुभम नांदेकर, पांढुर्णा।
पांढुर्णा में सदियों पुरानी और देश-दुनिया में चर्चित गोटमार मेले का आयोजन कल 11 सितंबर को होगा। पोला पर्व के अगले दिन जाम नदी के तट पर पांढुर्णा और सावरगांव के लोग परंपरा के नाम पर आमने-सामने आते हैं। नदी के बीच लगाए जाने वाले पलाश के झंडे को लेकर होने वाली पत्थरबाजी इस मेले की सबसे विवादित पहचान रही है। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में अब तक 15 लोगों की जान जाने की बात सामने आती रही है, जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल हो चुके हैं।
एक ओर आस्था और परंपरा के निर्वहन की तैयारी है, तो दूसरी ओर प्रशासन के सामने मानव जीवन की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बड़ी चुनौती है।
चंडिका माता के दर्शन के बाद शुरू होती है परंपरा
गोटमार मेले की आराध्य देवी मां चंडिका के मंदिर में सुबह से श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ेगी। मान्यता के अनुसार खिलाड़ी पहले मां चंडिका के दर्शन कर आशीर्वाद लेते हैं और इसके बाद मेले में शामिल होते हैं।
600 जवानों का सुरक्षा घेरा, हर गतिविधि पर नजर
मेले को लेकर प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा इंतजाम किए हैं। करीब 600 पुलिसकर्मी, 22 एंबुलेंस, 44 डॉक्टर और 7 अस्थायी स्वास्थ्य शिविर तैनात रहेंगे। निगरानी के लिए 10 सीसीटीवी कैमरे और 3 ड्रोन कैमरों का इस्तेमाल किया जाएगा। जाम नदी के पानी को भी रोका गया है, ताकि सुरक्षा और राहत व्यवस्था में किसी तरह की बाधा न आए।

कलेक्टर नीरज कुमार वशिष्ठ और पुलिस अधिकारियों ने शांति समिति की बैठकों में लोगों से गोफन और पत्थरबाजी से बचने तथा शांतिपूर्ण तरीके से पर्व मनाने की अपील की है।
धारा 163 लागू, हथियार और गोफन पर पूर्ण प्रतिबंध
कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी नीरज कुमार वशिष्ठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 163 के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किया है। आदेश 10 सितंबर शाम 4 बजे से 12 सितंबर सुबह 8 बजे तक प्रभावी रहेगा।
इसके तहत मेला क्षेत्र और नगर पालिका क्षेत्र में चाकू, लोहे की छड़, लाठी, तलवार, भाला, बरछी, फरसा, गंडासा, गोफन समेत अन्य हथियारों को लेकर चलने और सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक रहेगी।
मेला क्षेत्र के 500 मीटर के दायरे में डीजे, ध्वनि विस्तारक यंत्र और तेज आवाज वाले वाद्य यंत्रों पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। पहुंच मार्ग पर अस्थायी दुकानें और ठेले लगाने पर भी रोक रहेगी।
सोशल मीडिया भी प्रशासन के रडार पर
प्रशासन ने सोशल मीडिया पर भी सख्ती बरती है। व्हाट्सऐप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और टेलीग्राम आदि पर ऐसी भ्रामक, अफवाहजनक या आपत्तिजनक सामग्री पोस्ट या फॉरवर्ड करने पर कार्रवाई की चेतावनी दी गई है, जिससे धार्मिक भावनाएं आहत हों या सामाजिक सौहार्द बिगड़े।
आदेश का उल्लंघन करने वालों पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 223 सहित अन्य कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
क्यों खेला जाता है गोटमार? दो कहानियां, एक परंपरा
प्रेमी युगल की कहानी
लोककथा के अनुसार पांढुर्णा का एक युवक सावरगांव की युवती से प्रेम करता था। दोनों के जाम नदी के बीच पहुंचने की खबर सावरगांव में फैल गई। युवती को वापस ले जाने के लिए लोग नदी की ओर पहुंचे और दोनों ओर से पत्थरबाजी शुरू हो गई। इस घटना में प्रेमी युगल की मौत होने की बात कही जाती है। लोकमान्यता के अनुसार इसी घटना से गोटमार की परंपरा जुड़ी है।
युद्धाभ्यास की कहानी
दूसरी मान्यता इसे भोंसला शासनकाल की सैन्य परंपरा से जोड़ती है। कहा जाता है कि जाम नदी के किनारे सैनिक युद्धाभ्यास के दौरान नदी के बीच झंडा लगाकर निशानेबाजी और पत्थरबाजी का अभ्यास करते थे। समय के साथ यही अभ्यास लोकपरंपरा में बदल गया।
परंपरा के साथ जुड़े हैं दर्द के अध्याय
गोटमार मेले का एक दूसरा चेहरा उन परिवारों का है जिन्होंने इस परंपरा के दौरान अपने अपनों को खोया। किसी ने पति खोया, किसी ने बेटा, किसी ने पिता तो किसी ने भाई। मेले की तारीख नजदीक आते ही इन परिवारों के पुराने जख्म और यादें फिर ताजा हो जाती हैं।
रबर बॉल से रोकने की कोशिश भी नहीं चली
प्रशासन वर्षों से गोटमार की हिंसक परंपरा को रोकने के प्रयास करता रहा है। एक बार पत्थरों की जगह रबर बॉल से खेल कराने की कोशिश भी की गई, लेकिन प्रयोग सफल नहीं रहा और कुछ ही देर में खिलाड़ियों ने फिर पत्थरों का इस्तेमाल शुरू कर दिया।
मानवाधिकार से जुड़े सवालों के बीच प्रशासन हर साल सुरक्षा व्यवस्था और अपीलों के जरिए इस परंपरा को नियंत्रित करने का प्रयास करता है। इस बार भी सबसे बड़ा सवाल यही है –क्या प्रशासन की अपील और सख्ती के बीच गोटमार शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न होगा?
कल जाम नदी के दोनों छोर परंपरा और प्रशासन-दोनों की परीक्षा होगी।