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मध्यप्रदेश में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने को कैबिनेट की मंजूरी, विवाह-तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन के लिए बनेगा एक समान कानून

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  • जगदीशपुर की ऐतिहासिक कैबिनेट बैठक में बड़ा फैसला
  • तीन तलाक, निकाह हलाला जैसी प्रथाओं पर सख्ती, लिव-इन का रजिस्ट्रेशन होगा अनिवार्य
  • महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को मिलेगा अधिक कानूनी संरक्षण
  • अनुसूचित जनजातियों को रखा गया संहिता के दायरे से बाहर

भोपाल | THE NewsBar

मध्यप्रदेश के लिए 19 जुलाई का दिन ऐतिहासिक बन गया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में जगदीशपुर में आयोजित विशेष कैबिनेट बैठक में ‘मध्यप्रदेश समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-UCC), 2026’ के प्रारूप को मंजूरी दे दी गई। इसके साथ ही विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, वसीयत और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे व्यक्तिगत मामलों के लिए सभी धर्मों के नागरिकों पर एक समान नागरिक कानून लागू करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है।

कैबिनेट बैठक के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद-44 में निहित समान नागरिक संहिता के उद्देश्य को साकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसका उद्देश्य सभी नागरिकों को समान अधिकार देना, महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को समाप्त करना और व्यक्तिगत कानूनों को आधुनिक एवं न्यायसंगत बनाना है।

महिलाओं की सुरक्षा और समान अधिकार पर विशेष जोर

मुख्यमंत्री ने कहा कि नई संहिता का सबसे बड़ा उद्देश्य महिलाओं को विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामलों में समान अधिकार देना है। अब अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण होने वाले भेदभाव को समाप्त कर एक समान कानूनी व्यवस्था लागू की जाएगी। साथ ही धार्मिक परंपराओं और रीति-रिवाजों को भी संरक्षण मिलेगा, बशर्ते वे सार्वजनिक नीति और नैतिकता के अनुरूप हों।

अनुसूचित जनजातियों को मिलेगा संवैधानिक संरक्षण

नई संहिता संविधान के अनुच्छेद-342 के तहत आने वाली अनुसूचित जनजातियों जैसे भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया सहित अन्य संरक्षित समुदायों पर लागू नहीं होगी। सरकार ने स्पष्ट किया है कि इन समुदायों के पारंपरिक अधिकार पहले की तरह सुरक्षित रहेंगे।

विवाह और तलाक में बड़े बदलाव

नई संहिता के तहत पूरे प्रदेश में केवल एक विवाह (मोनोगैमी) को ही मान्यता मिलेगी। एक समय में एक से अधिक विवाह पर रोक रहेगी। विवाह के लिए पुरुष की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिला की 18 वर्ष निर्धारित की गई है।

अब तीन तलाक, मौखिक तलाक और पंचायत के गैर-कानूनी फैसलों को मान्यता नहीं मिलेगी। तलाक केवल कानून में निर्धारित वैधानिक आधारों पर ही संभव होगा। निकाह हलाला जैसी प्रथाओं को बढ़ावा देना या किसी महिला को इसके लिए मजबूर करना दंडनीय अपराध माना जाएगा।

विवाह और तलाक का रजिस्ट्रेशन होगा अनिवार्य

शहरी क्षेत्रों में MP ई-नगर पालिका पोर्टल तथा ग्रामीण क्षेत्रों में एसडीएम, नगर निकाय या ग्राम पंचायत के माध्यम से विवाह और तलाक का पंजीयन कराया जाएगा। रजिस्ट्रेशन न होने से विवाह अमान्य नहीं होगा, लेकिन निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं करने पर दंड का प्रावधान रहेगा।

बच्चों को मिलेगा समान कानूनी दर्जा

नई संहिता में ‘अवैध संतान’ शब्द को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। विवाह, लिव-इन, गोद लेने, सरोगेसी या ART तकनीक से जन्मे सभी बच्चों को समान कानूनी अधिकार प्राप्त होंगे। किसी भी अभिरक्षा (कस्टडी) विवाद में अदालत का पहला आधार बच्चे का हित होगा।

उत्तराधिकार में बेटा-बेटी समान

संपत्ति के उत्तराधिकार में बेटा और बेटी दोनों को समान अधिकार मिलेंगे। विधवा और विधुर के अधिकार भी समान होंगे। माता और पिता दोनों को क्लास-1 उत्तराधिकारी माना जाएगा। यदि किसी व्यक्ति का कोई वैध उत्तराधिकारी नहीं होगा तो उसकी संपत्ति राज्य सरकार के पास जाएगी।

वसीयत की पूरी स्वतंत्रता

नई व्यवस्था के तहत कोई भी स्वस्थ वयस्क अपनी स्वयं अर्जित या पैतृक संपत्ति की 100 प्रतिशत वसीयत अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी व्यक्ति के नाम कर सकेगा।

लिव-इन रिलेशनशिप का होगा अनिवार्य पंजीयन

लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों को साथ रहने के एक महीने के भीतर रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा। यदि किसी पार्टनर की उम्र 21 वर्ष से कम होगी तो इसकी सूचना अभिभावकों को दी जाएगी। रजिस्ट्रार स्थानीय पुलिस को भी इसकी जानकारी भेजेगा।

महिला पार्टनर और बच्चों को मिलेगा कानूनी संरक्षण

लिव-इन से जन्मे बच्चों को पूरी तरह वैध माना जाएगा और उन्हें संपत्ति में समान अधिकार मिलेगा। यदि पुरुष पार्टनर महिला को छोड़ देता है तो महिला अदालत में कानूनी पत्नी की तरह भरण-पोषण का दावा कर सकेगी।

उल्लंघन पर सजा का प्रावधान

बिना रजिस्ट्रेशन एक महीने से अधिक समय तक लिव-इन में रहने पर 3 माह तक की जेल या 10 हजार रुपये जुर्माना हो सकता है। गलत जानकारी देने पर 3 माह की जेल और 25 हजार रुपये जुर्माना, जबकि नोटिस के बाद भी जानकारी नहीं देने पर 6 माह तक की जेल और 25 हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान रखा गया है।

मुख्यमंत्री बोले- संविधान की भावना को मिलेगा बल

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि मध्यप्रदेश का यह कदम संविधान में निहित समानता, न्याय, धर्मनिरपेक्षता और लैंगिक समानता के मूल्यों को मजबूत करेगा। उन्होंने बताया कि इस संहिता का प्रारूप उत्तराखंड, गुजरात और असम में लागू समान नागरिक संहिता का अध्ययन करने के बाद तैयार किया गया है।

THE NewsBar | यह निर्णय मध्यप्रदेश की कानूनी व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। महिलाओं के अधिकारों, बच्चों की सुरक्षा, उत्तराधिकार में समानता और विवाह संबंधी कानूनों को एकरूप बनाने की दिशा में इसे राज्य सरकार का ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

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