यह दृश्य किसी आपदा या युद्धग्रस्त क्षेत्र का नहीं, बल्कि उस प्रदेश का है जहां विकास और स्वास्थ्य सुविधाओं के दावे लगातार किए जाते हैं.. .
THE NewsBar | शुभम नांदेकर, छिंदवाड़ा। एक ओर सरकार “डिजिटल इंडिया” और ग्रामीण विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से सामने आई एक तस्वीर उन दावों की जमीनी हकीकत बयां कर रही है। अमरवाड़ा विकासखंड के ग्राम हथोड़ा के लोहरी मोहल्ला में एक गर्भवती महिला को सिर्फ इसलिए घर पर बच्चे को जन्म देना पड़ा क्योंकि गांव तक न सड़क है, न पुल और न ही समय पर एंबुलेंस पहुंच सकी।
बारिश के बीच जब महिला को प्रसव पीड़ा शुरू हुई तो परिजनों ने तत्काल सरकारी एंबुलेंस को सूचना दी। लेकिन गांव तक पहुंचने का रास्ता नदी और कच्चे मार्ग से होकर गुजरता है। नदी पर पुल नहीं होने के कारण एंबुलेंस बीच रास्ते में ही रुक गई और महिला तक नहीं पहुंच सकी। मदद की आस टूटने लगी और आखिरकार मजबूरी में महिला की घर पर ही डिलीवरी करानी पड़ी।
खटिया बनी एंबुलेंस, युवाओं ने बचाई मां-बेटे की जान
प्रसव के बाद जच्चा-बच्चा की हालत बिगड़ने लगी तो गांव के युवाओं ने मानवता की मिसाल पेश की। उन्होंने महिला को खटिया पर लिटाया और कंधों पर उठाकर उफनती नदी की तेज धार के बीच से पार कराया। नदी पार करने के बाद भी मुश्किलें खत्म नहीं हुईं। सड़क और वाहन की सुविधा न होने के कारण मां और नवजात को मोटरसाइकिल पर बैठाकर कई किलोमीटर दूर अस्पताल पहुंचाया गया।
दशकों से मांग, फिर भी नहीं बना पुल
लोहरी मोहल्ले में लगभग 20 आदिवासी परिवार वर्षों से निवास कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि बारिश के मौसम में उनका गांव पूरी तरह कट जाता है। स्कूल जाने वाले बच्चों से लेकर बीमार और गर्भवती महिलाओं तक सभी को जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ती है।
ग्रामीणों के अनुसार, कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से सड़क और पुलिया निर्माण की मांग की गई, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला। नतीजा यह है कि आज भी किसी भी आपात स्थिति में मरीजों को खटिया पर लादकर नदी पार कराना उनकी मजबूरी बनी हुई है।
“जब भी गांव में कोई बीमार होता है या कोई इमरजेंसी आती है, तो हमारे पास मरीज को खटिया पर उठाकर नदी पार कराने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता।” – स्थानीय ग्रामीण
सवालों के घेरे में व्यवस्था
यह घटना सिर्फ एक महिला की पीड़ा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर बड़ा सवाल है जो आज भी दूरदराज के आदिवासी इलाकों तक सड़क, पुल और स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुंचा सकी है। यदि समय रहते सड़क और पुलिया का निर्माण हुआ होता तो शायद एक प्रसूता को घर में प्रसव करने और ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार करने की नौबत नहीं आती।
छिंदवाड़ा की यह तस्वीर विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की गहरी खाई को उजागर करती है।