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नई दिल्ली: अब 3 महीने से बड़े बच्चे को गोद लेने वाली माताओं को भी मिलेगी ‘मैटरनिटी लीव’, सुप्रीम कोर्ट ने बताया मानवाधिकार

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) को लेकर एक युगांतरकारी फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अब उन महिलाओं को भी पूरी मैटरनिटी लीव दी जाएगी, जो 3 महीने से अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेती हैं। अदालत ने इस अधिकार को ‘मूलभूत मानवाधिकार’ करार देते हुए कहा कि एक गोद लिया हुआ बच्चा, जैविक बच्चे (Biological Child) से किसी भी तरह अलग नहीं है।

क्या था पुराना नियम और क्या बदला?

अब तक के नियमों के अनुसार, मातृत्व लाभ अधिनियम (Maternity Benefit Act) के तहत केवल उन्हीं माताओं को 12 सप्ताह की छुट्टी का लाभ मिलता था, जो 3 महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेती थीं। यदि बच्चा 3 महीने से बड़ा होता था, तो मां इस सुविधा से वंचित रह जाती थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस विसंगति को दूर करते हुए अब उम्र की इस बंदिश को खत्म कर दिया है।

“गोद लिया बच्चा जैविक बच्चे से अलग नहीं”

फैसला सुनाते हुए शीर्ष अदालत ने मानवीय पहलुओं पर जोर दिया। कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां निम्नलिखित हैं:

  • समानता का अधिकार: गोद लेने वाली मां और जैविक मां के बीच अधिकारों में भेदभाव नहीं किया जा सकता।

  • शिशु संरक्षण: बच्चा चाहे किसी भी उम्र का हो, उसे नई मां के साथ तालमेल बिठाने और देखभाल के लिए समय की आवश्यकता होती है।

  • मानवाधिकार: मातृत्व संरक्षण केवल एक कानूनी लाभ नहीं, बल्कि एक अनिवार्य मानवाधिकार है।

गोद लेने वाले माता-पिताओं को बड़ी राहत

यह फैसला उन हजारों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण लेकर आया है जो बच्चे गोद लेने की प्रक्रिया में हैं। इससे न केवल कामकाजी महिलाओं को अपने नए बच्चे के साथ भावनात्मक जुड़ाव बनाने का समय मिलेगा, बल्कि समाज में दत्तक ग्रहण (Adoption) को लेकर सकारात्मक संदेश भी जाएगा।

पैटरनिटी लीव (Paternity Leave) पर गेंद सरकार के पाले में

जहाँ कोर्ट ने माताओं के लिए बड़ा फैसला सुनाया, वहीं पिता को मिलने वाली छुट्टियों (Paternity Leave) के मामले पर अदालत ने कहा कि इसके नियम तय करना और बदलाव करना केंद्र सरकार का काम है। अब यह सरकार को तय करना होगा कि पिताओं के लिए अवकाश की क्या व्यवस्था होनी चाहिए।

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