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अमेरिका की ‘सुरक्षा गारंटी’ फेल! क्या अब खुद के हथियारों के भरोसे ही बचेगा हर मुल्क?

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2035 तक 5 गुना बढ़ जाएगा युद्ध का बजट! ‘हवाई चप्पल’ और अस्पताल के पैसों से खरीदे जाएंगे टैंक; पढ़ें क्या है ‘सिक्योरोनामिक्स’

HighLights

  • अमेरिकी सुरक्षा गारंटी की विफलता उजागर हुई।
  • वैश्विक रक्षा खर्च में भारी वृद्धि का अनुमान।
  • भारत के लिए रक्षा आत्मनिर्भरता का अवसर।

पश्चिम एशिया की जंग और खतरनाक होती जा रही है। अमेरिका के सहयोगी खाड़ी देश ईरान के निशाने पर हैं और वह उनके ऊर्जा ढांचे को सफलतापूर्वक निशाना बना रहा है।

नई दिल्‍ली। पश्चिम एशिया की जंग और खतरनाक होती जा रही है। अमेरिका के सहयोगी खाड़ी देश ईरान के निशाने पर हैं और वह उनके ऊर्जा ढांचे को सफलतापूर्वक निशाना बना रहा है। इस युद्ध ने कई तरह की धारणाओं को तोड़ा है। साफ हो गया है कि अमेरिका अब किसी क्षेत्र या देश को सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकता है। खाड़ी के देश इसका उदाहरण हैं। तमाम अमेरिकी हथियार और रक्षा प्रणालियों की तैनाती और अमेरिका की सक्रिय मदद भी उनको ईरान की मिसाइलों से नहीं बचा पा रही है।

इस युद्ध ने अमेरिकी रक्षा तकनीक की सीमाओं को भी उजागर किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि विश्व में बढ़ती अस्थिरता और असुरक्षा के बीच देशों के बीच हथियारों की होड़ तेज होगी। बहुत से देशों को यह अहसास होगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर किसी दूसरे देश पर निर्भर रहना खतरनाक है और उन पर दबाव बढ़ेगा कि वह रक्षा खर्च बढ़ा कर अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत बनाएं। इसका मतलब है कि जो पैसा विकास पर खर्च होता, वह अब हथियार और सैन्य तैयारियों पर खर्च होगा। इस संभावित परिदृश्य की पड़ताल आज का अहम मुद्दा है…

खतरनाक हुआ वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य
पिछले करीब एक दशक से वैश्विक सुरक्षा चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। इसी दौरान अमेरिका अफगानिस्तान को उसके हाल पर छोड़ कर निकल गया। अमेरिका का मौजूदा नेतृत्व यह साफ संकेत दे रहा है कि एक महाशक्ति के तौर पर दुनिया में शांति स्थापित करने में अपनी भूमिका निभाने में उसकी खास दिलचस्पी नहीं है।

अमेरिका के लिए उसके हित ज्यादा अहम हैं। इसी के साथ अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थााओं को भी अप्रासांगिक बना दिया है।

पिछले एक दशक का वैश्विक सैन्य खर्च 21 ट्रिलियन डालर से अधिक रहा है। यह दुनिया में बढ़ते संघर्ष का गवाह है। ऐसे समय में जब दुनिया जलवायु परिवर्तन के भयावह खतरों का सामना कर रही है, वैश्विक परिदृश्य में अस्थिरता देशों को सैन्य खर्च बढ़ाने पर मजबूर रही है। इसका सबसे अधिक नुकसान आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को उठाना पड़ रहा है।

भविष्य का अनुमान
6.6 ट्रिलियन डालर पहुंच सकता है दुनिया का सैन्य खर्च 2035 तक
2.5 गुना होगा यह 2024 के वैश्विक सैन्य खर्च का
5 गुना होगा यह खर्च शीतयुद्ध खत्म होने के बाद के वैश्विक सैन्य खर्च का
शांति का दौर खत्म, क्या अब युद्ध ही नया सामान्य है?
समग्र आर्थिक विकास के विशेषज्ञ डॉ. विकास सिंह कहते हैं कि सोवियत संघ के विघटन के बाद करीब तीन दशकों तक वैश्विक अर्थव्यवस्था एक आरामदेह धारणा पर टिकी रही कि शांति या कम से कम महाशक्तियों के बीच बड़े युद्ध का अभाव ही सामान्य स्थिति है। इसके लाभ स्पष्ट थे। सरकारों ने संसाधनों को रक्षा जरूरतों से विकास की ओर मोड़ा। दुनिया में वैश्वीकरण इसी अनकहे समझौते पर फला-फूला। आज यह धारणा बिखर चुकी है। वैश्विक सैन्य खर्च लगभग 2.7 ट्रिलियन डालर तक पहुंच गया है। यह इतिहास का सबसे ऊंचा स्तर है। युद्ध अब अपवाद नहीं, बल्कि बजट में एक स्थायी मद बनता जा रहा है।

दुनिया भर में रक्षा खर्च अचानक क्यों बढ़ रहा है?
समग्र आर्थिक विकास के विशेषज्ञ डॉ. विकास सिंह के मुताबिक, दुनिया भर में रक्षा खर्च एक साथ बढ़ रहा है। यूरोप दशकों की उपेक्षा के बाद फिर से हथियारबंद हो रहा है। अमेरिका अपने विशाल सैन्य बजट को और बढ़ा रहा है। वह ऐसा केवल सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि औद्योगिक क्षमता के लिए भी कर रहा है। एशिया में भी ट्रेंड मजबूत हो रहा है। जापान अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत कर रहा है। यहां तक कि सीधे संघर्ष से अप्रभावित देश भी रक्षा पर अधिक खर्च कर रहे हैं।

क्या वैश्विक आर्थिक व्यवस्था एक नए दौर में प्रवेश कर गई?
इस बदलाव के पीछे कारण स्पष्ट हैं। शीत युद्ध के बाद की व्यवस्था, जो अमेरिकी प्रभुत्व और आर्थिक परस्पर निर्भरता पर आधारित थी, अब दरक रही है। महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा लौट आई है, आपूर्ति श्रृंखलाएं हथियार बन चुकी हैं और आर्थिक नीति अब रणनीतिक नजरिये से देखी जा रही है। यही वह दौर है जिसे ‘सिक्योरोनामिक्स’ कहा जा सकता है।

यह एक ऐसी व्यवस्था है, जहां दक्षता से अधिक महत्त्व लचीलेपन और नियंत्रण को दिया जाता है। लेकिन इस बदलाव की एक कीमत है, जिस पर कम चर्चा होती है। सार्वजनिक बजट सीमित होते हैं, खासकर उभरती अर्थव्यवस्थाओं में।


क्या बढ़ता रक्षा बजट विकास के संसाधनों को निगल रहा है?
रक्षा खर्च बढ़ाने का मतलब अक्सर यह होता है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों के लिए कम संसाधन बचें। सरल शब्दों में, हर अतिरिक्त टैंक या मिसाइल, एक स्कूल या अस्पताल की कीमत पर आता है। आर्थिक दृष्टि से भी यह एक जटिल मामला है।

रक्षा खर्च अल्पकाल में मांग बढ़ा सकता है, रोजगार पैदा कर सकता है लेकिन यह हमेशा उत्पादक क्षमता को नहीं बढ़ाता। बढ़ते सैन्य बजट जीडीपी को चमका सकते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर विकास की नींव कमजोर हो सकती है। फिर भी रक्षा खर्च पूरी तरह निष्प्रभावी नहीं है। कुछ देशों ने इसे औद्योगिक नीति का मजबूत साधन बनाया है।

क्या रक्षा निवेश आर्थिक विकास का इंजन भी बन सकता है?
अमेरिका में रक्षा क्षेत्र ने एयरोस्पेस, कंप्यूटिंग और संचार जैसे क्षेत्रों में नवाचार को बढ़ावा दिया। इजरायल ने सैन्य अनुसंधान को एक व्यापक तकनीकी अर्थव्यवस्था में बदल दिया। अब यूरोप भी इसी दिशा में कदम बढ़ा रहा है, जहां रक्षा निवेश को औद्योगिक पुनरुत्थान से जोड़ा जा रहा है। यही प्रवृत्ति अब वैश्विक हो रही है।

रक्षा केवल सुरक्षा का साधन नहीं रह गई, बल्कि आर्थिक रणनीति का हिस्सा बनती जा रही है। देश उत्पादन को स्थानीय बनाने, घरेलू क्षमताएं विकसित करने और बाहरी निर्भरता घटाने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में सुरक्षा और अर्थव्यवस्था की सीमाएं धुंधली हो रही हैं।

भारत के लिए यह अवसर है या चुनौती?
भारत के लिए यह स्थिति एक अवसर भी है और चुनौती भी। लंबे समय तक भारत दुनिया के सबसे बड़े रक्षा आयातकों में रहा है, रणनीतिक रूप से असुविधाजनक और आर्थिक रूप से महंगा है। हाल के वर्षों में सरकार ने स्वदेशीकरण, नीति सुधारों और निजी क्षेत्र की भागीदारी के जरिये इस निर्भरता को कम करने की कोशिश की है। लक्ष्य स्पष्ट है खरीदार से निर्माता और अंततः निर्यातक बनना। भारत के पास इसके लिए आधार भी है। बड़ा घरेलू बाजार, लागत में प्रतिस्पर्धा और बढ़ती इंजीनियरिंग क्षमता। ड्रोन, तोपखाने, नौसैनिक प्लेटफार्म और इलेक्ट्रानिक्स जैसे क्षेत्रों में संभावनाएं मौजूद हैं।

आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग के रास्ते में क्या बड़ी चुनौतियां हैं?
चुनौतियां भी कम नहीं हैं। रक्षा निर्माण केवल असेंबली का काम नहीं, बल्कि उन्नत तकनीक और गहरे कौशल की मांग करता है। भारत अब भी कई महत्वपूर्ण तकनीकों के लिए विदेशी साझेदारों पर निर्भर है। असली आत्मनिर्भरता केवल उत्पादन से नहीं, बल्कि बौद्धिक संपदा और डिजाइन क्षमता से आती है, जो हासिल करना कठिन है। बड़ा जोखिम यह है कि कहीं उत्साह में संतुलन न बिगड़ जाए। दाल से पहले बंदूकों का मतलब केवल प्राथमिकताओं का बदलाव नहीं, बल्कि विकास की नींव को कमजोर करना भी हो सकता है।

क्या रक्षा और विकास के बीच संतुलन बना पाना मुश्किल?
यदि शिक्षा, स्वास्थ्य और शहरी ढांचे की अनदेखी की जाती है, तो भविष्य में आर्थिक क्षमता प्रभावित होगी। भारत की असली चुनौती चुनाव करना नहीं, बल्कि संतुलन बनाए रखना है। रक्षा और विकास प्रतिस्पर्धी नहीं, पूरक होने चाहिए। एक मजबूत सेना उतनी ही टिकाऊ है, जितनी मजबूत अर्थव्यवस्था उसे सहारा देती है।

दुनिया नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां सुरक्षा खर्च सामान्य हो गया है। सफलता उन देशों को मिलेगी, जो रक्षा को एक अलग बोझ नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक रणनीति का हिस्सा बनाएंगे और साथ ही मानव पूंजी में निवेश जारी रखेंगे।

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