626 से अधिक घायल, 28 गंभीर; 17 घायलों को नागपुर रेफर – जाम नदी में झंडे को लेकर पांढुर्णा-सावरगांव पक्ष आमने-सामने, घंटों चली पत्थरबाजी
THE NewsBar | शुभम नांदेकर, पांढुर्णा।
क्या आपने कभी ऐसा मेला देखा है, जहां आस्था और परंपरा के साथ पत्थरों की बरसात होती हो? जहां हर साल सैकड़ों लोग घायल होते हैं और इसके बावजूद सदियों पुरानी परंपरा कायम रहती है। मध्यप्रदेश के पांढुर्णा जिले में शुक्रवार को आयोजित विश्व प्रसिद्ध गोटमार मेले में एक बार फिर ऐसा ही मंजर देखने को मिला।
जाम नदी के दोनों किनारों पर बसे पांढुर्णा और सावरगांव के लोग सुबह से ही आमने-सामने आ गए। चंडी माता की पूजा-अर्चना और जाम नदी में लगाए गए पलाश के झंडे की पूजा के बाद शुरू हुआ गोटमार देखते ही देखते भीषण पत्थरबाजी में बदल गया। दोनों पक्षों के खिलाड़ी एक-दूसरे पर लगातार पत्थर बरसाते रहे।
शाम तक प्राप्त जानकारी के अनुसार 626 से अधिक लोग घायल हुए, जिनमें 28 घायलों को गंभीर चोटों के कारण अस्पताल में भर्ती कर उपचार दिया गया, जबकि 17 घायलों को बेहतर उपचार के लिए नागपुर रेफर किया गया। घायलों में सिर, पैर, आंख, नाक सहित शरीर के अलग-अलग हिस्सों में चोटें आई हैं।
सुबह पूजा के साथ शुरू हुआ गोटमार
गोटमार मेले की शुरुआत शुक्रवार सुबह चंडी माता मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ हुई। इसके बाद जाम नदी के बीच लगाए गए पलाश के झंडे की पूजा की गई। परंपरा के अनुसार पांढुर्णा और सावरगांव पक्ष के खिलाड़ी नदी के दोनों किनारों से झंडे को लेकर एक-दूसरे पर पत्थर बरसाने लगे।
सुबह करीब 8 से 10 बजे के बीच शुरू हुआ पथराव कुछ ही देर में तेज हो गया। दोपहर तक बड़ी संख्या में लोग घायल होकर अस्पताल और मेडिकल कैंप पहुंचने लगे।
चार हजार से अधिक खिलाड़ी, हजारों दर्शक बने गवाह
इस वर्ष गोटमार में दोनों पक्षों के करीब चार हजार से अधिक खिलाड़ी प्रत्यक्ष रूप से शामिल हुए। वहीं दोपहर तक मेले को देखने के लिए 25 हजार से अधिक लोगों के पहुंचने की जानकारी सामने आई।
जाम नदी के दोनों किनारों पर बड़ी संख्या में पुलिस बल और प्रशासनिक अधिकारी तैनात रहे। भीड़ को नियंत्रित करने और घायलों को तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए कैंप अस्पताल से सिविल अस्पताल तथा गंभीर घायलों को नागपुर पहुंचाने की व्यवस्था की गई।
पत्थरबाजी में विधायक उइके भी उतरे मैदान में
गोटमार मेले के दौरान क्षेत्रीय विधायक निलेश उइके भी पांढुर्णा पक्ष की ओर से मैदान में नजर आए। दोपहर करीब 3:15 बजे मेला स्थल पहुंचे विधायक ने पांढुर्णा पक्ष की ओर से पत्थरबाजी में हिस्सा लिया।
विधायक ने कहा कि गोटमार मेला पांढुर्णा की परंपरा और आस्था का प्रतीक है तथा वे जनभावनाओं के अनुरूप इस परंपरा के साथ हैं। हालांकि, विधायक के पत्थरबाजी में शामिल होने को लेकर भी अब सवाल उठ रहे हैं कि जनप्रतिनिधियों की भूमिका परंपरा के समर्थन तक सीमित रहनी चाहिए या उन्हें ऐसे आयोजन में प्रत्यक्ष भाग लेना चाहिए।
अस्पतालों में बढ़ती गई घायलों की संख्या
पत्थरबाजी के दौरान घायल लोगों को लगातार मेडिकल कैंप और सिविल अस्पताल पहुंचाया गया। शुरुआती जानकारी में दोपहर 12 बजे तक 69 खिलाड़ी घायल बताए गए थे। दोपहर 3 बजे तक यह आंकड़ा 300 के पार पहुंच गया, जबकि बाद में घायलों की संख्या लगातार बढ़ती गई।
कई लोगों को सिर पर चोट लगी, जबकि कुछ खिलाड़ियों के पैरों में गंभीर चोटें आईं। कुछ मामलों में पैर की हड्डी टूटने की जानकारी भी सामने आई। गंभीर घायलों को तत्काल नागपुर रेफर किया गया।
नागपुर रेफर किए गए घायलों में संजय धारपुरे निवासी सावरगांव, सचिन हाटेकर निवासी राधाकृष्ण वार्ड, पंकज बारमासे निवासी खारी वार्ड, सचिन नासरे निवासी पांढुर्णा, नितिन भादे निवासी पांढुर्णा, कैलाश साहू निवासी नानंदवाड़ी और प्रीतम राउत के नाम सामने आए हैं।
कलेक्टर-एसपी सहित प्रशासन की नजर
मेले को लेकर प्रशासन ने पहले से व्यापक इंतजाम किए थे। जिला कलेक्टर नीरज वशिष्ठ, पुलिस अधीक्षक सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी पूरे आयोजन के दौरान अलग-अलग कैंपों से व्यवस्थाओं पर नजर बनाए रहे।
घायलों को तत्काल उपचार उपलब्ध कराने के लिए मेडिकल कैंप बनाए गए थे। गंभीर स्थिति वाले मरीजों को सिविल अस्पताल से नागपुर भेजने के लिए परिवहन की व्यवस्था भी रखी गई थी।
हालांकि, इतनी बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने के बाद प्रशासन की तैयारियों और इस परंपरा को नियंत्रित करने के तरीके पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
शराब, जुआ और सट्टे पर भी सवाल
गोटमार मेले के साथ हर वर्ष बड़ी भीड़ जुटती है। मेले के दौरान शराब, जुआ और सट्टे जैसी गतिविधियों को लेकर भी शिकायतें और चर्चाएं सामने आती रही हैं। ऐसे में सवाल यह है कि हजारों लोगों की मौजूदगी वाले इस आयोजन में कानून-व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन की निगरानी कितनी प्रभावी रही।
आखिर कौन जीता, कौन हारा?
गोटमार में झंडे को तोड़ना और उसे अपने पक्ष की ओर ले जाना परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इस वर्ष भी पांढुर्णा पक्ष के खिलाड़ी अपनी जान की परवाह किए बिना झंडे तक पहुंचने और उसे काटने के प्रयास में जुटे रहे।
शाम करीब 6 बजे पांढुर्णा पक्ष के खिलाड़ी झंडा काटने में सफल रहे, लेकिन सावरगांव पक्ष की लगातार पत्थरबाजी के कारण झंडे को पांढुर्णा की ओर ले जाने में सफल नहीं हो सके।
अंततः दोनों गांवों के वरिष्ठ गोटमार खिलाड़ियों ने नदी से झंडा निकालकर उसे चंडी माता मंदिर में समर्पित किया, जिसके बाद गोटमार को विराम दिया गया। इसलिए इस वर्ष इसे केवल किसी एक पक्ष की जीत या हार कहना उचित नहीं होगा।
प्रेम कहानी से जुड़ी है गोटमार की लोककथा
गोटमार मेले की शुरुआत को लेकर एक प्रचलित लोककथा भी है। माना जाता है कि सदियों पहले पांढुर्णा का एक युवक सावरगांव की युवती से प्रेम करता था। दोनों परिवारों की सहमति के बिना साथ जाने के लिए जाम नदी पार कर रहे थे। इसी दौरान दोनों गांवों के लोगों के बीच विवाद हुआ और पत्थरबाजी शुरू हो गई। लोककथा के अनुसार इसी घटना में प्रेमी युगल की मौत हो गई।
कहा जाता है कि इस घटना की स्मृति में बाद में जाम नदी के बीच पलाश का झंडा स्थापित कर दोनों पक्षों के बीच पत्थरबाजी की परंपरा शुरू हुई, जो समय के साथ गोटमार मेले के रूप में प्रसिद्ध हो गई।
हालांकि, इस प्रेमकथा की ऐतिहासिक पुष्टि अलग-अलग स्रोतों में एक जैसी नहीं मिलती और इसे मुख्यतः स्थानीय लोकमान्यता के रूप में देखा जाता है।
सदियों पुरानी परंपरा या हिंसा का उत्सव?
गोटमार पांढुर्णा की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान से जुड़ा आयोजन है। बड़ी संख्या में लोग इसे आस्था और परंपरा के रूप में देखते हैं। लेकिन दूसरी ओर हर वर्ष बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने के कारण इस आयोजन के स्वरूप पर गंभीर सवाल भी उठते हैं।
जब किसी परंपरा में सैकड़ों लोग घायल हों, गंभीर चोटें आएं और घायलों को दूसरे शहरों में रेफर करना पड़े, तो सवाल उठना स्वाभाविक है- क्या परंपरा को उसी स्वरूप में जारी रखना जरूरी है?
गोटमार मेले की पहचान और आस्था अपनी जगह है, लेकिन इसके साथ जुड़ी हिंसा और चोटों को कम करने की चुनौती भी उतनी ही बड़ी है। शुक्रवार का आयोजन एक बार फिर प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और समाज के सामने यही सवाल छोड़ गया कि परंपरा को बचाते हुए इसे सुरक्षित कैसे बनाया जाए?