🚨 मध्य प्रदेश में 1160 करोड़ रुपये के कथित इथेनॉल-चावल घोटाले ने सबको चौंका दिया है। जिस फोर्टिफाइड चावल से बच्चों, गर्भवती महिलाओं और किशोरियों का पोषण होना था, उसके दुरुपयोग के आरोप सामने आए हैं। SIT जांच में अब तक 4 गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। आखिर कैसे चला करोड़ों का यह खेल.? पढ़ें पूरी रिपोर्ट सिर्फ THE NewsBar पर।
THE NewsBar | शुभम नांदेकर, भोपाल। मध्य प्रदेश में इथेनॉल उत्पादन के नाम पर सामने आए 1160 करोड़ रुपये के कथित फोर्टिफाइड चावल घोटाले ने सरकारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस पोषणयुक्त (फोर्टिफाइड) चावल को कुपोषण और एनीमिया से बचाने के लिए बच्चों, गर्भवती महिलाओं और किशोरियों तक पहुंचना था, वही अफसरों, राइस मिलर्स और इथेनॉल प्लांट संचालकों की कथित मिलीभगत से करोड़ों के खेल का हिस्सा बन गया।
प्रारंभिक जांच के अनुसार, करीब 5 लाख मीट्रिक टन (50 लाख क्विंटल) सरकारी फोर्टिफाइड चावल, जिसकी अनुमानित कीमत 1160 करोड़ रुपये है, इथेनॉल उत्पादन के लिए आवंटित किया गया था। लेकिन आरोप है कि इस चावल का उपयोग इथेनॉल बनाने में नहीं किया गया, बल्कि उसे राइस मिलों के जरिए दोबारा सरकारी गोदामों तक पहुंचाकर पूरे सिस्टम का दुरुपयोग किया गया।
कैसे खुला घोटाले का राज.?
मामले का खुलासा तब हुआ जब 2 जून को बालाघाट के नवेगांव गोदाम से सरकारी चावल से भरे तीन ट्रक छिंदवाड़ा के बोरगांव स्थित एवीजे इथेनॉल प्लांट के लिए रवाना हुए। सरकारी रिकॉर्ड में ट्रकों का गंतव्य इथेनॉल प्लांट दर्ज था, लेकिन अगले दिन जांच में एक ट्रक बालाघाट की एक राइस मिल में खड़ा मिला, जबकि दो अन्य ट्रक अपने तय स्थान तक पहुंचे ही नहीं।
यहीं से शक गहराया और पुलिस ने स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) का गठन किया। अब तक बालाघाट, छिंदवाड़ा-पांढुर्णा और सिवनी में कार्रवाई के दौरान 12 ट्रक जब्त किए जा चुके हैं, 40 से अधिक लोगों से पूछताछ हुई है और 4 आरोपियों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है।
ऐसे चलता था करोड़ों का खेल
जांच में सामने आया कि इथेनॉल प्लांट संचालकों को सरकार फोर्टिफाइड चावल 2320 रुपये प्रति क्विंटल की रियायती दर पर उपलब्ध कराती थी। जबकि खुले बाजार में इथेनॉल बनाने के लिए उपयोग होने वाला टूटा चावल इससे भी सस्ता, करीब 2100 रुपये प्रति क्विंटल में मिल जाता था।
आरोप है कि प्लांट संचालक सरकारी चावल से इथेनॉल बनाने के बजाय उसे लगभग 2800 रुपये प्रति क्विंटल की दर से राइस मिलर्स को बेच देते थे। इसके बाद राइस मिलर्स उसी चावल को नई बोरियों में भरकर कस्टम मिल्ड राइस के रूप में दोबारा सरकारी गोदामों में जमा कर देते थे।
इस पूरे खेल में राइस मिलर्स को धान की वास्तविक मिलिंग का खर्च बच जाता था, सरकार से मिलिंग शुल्क भी मिल जाता था और मिलिंग के लिए मिला असली धान खुले बाजार में बेचकर अलग से मुनाफा कमाया जाता था।
नियमों की अनदेखी, निगरानी व्यवस्था पर सवाल
जांच में यह भी सामने आया कि FIFO (First In, First Out) नियम के अनुसार गोदामों में पहले से रखा पुराना चावल इथेनॉल के लिए जारी किया जाना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय नया फोर्टिफाइड चावल आवंटित किया गया।
आरोप है कि चावल आवंटन की गोपनीय जानकारी पहले ही संबंधित लोगों तक पहुंचा दी जाती थी। वहीं राइस मिलों के बिजली उपभोग, लेबर रिकॉर्ड और मिलिंग प्रक्रिया की प्रभावी निगरानी नहीं होने से यह कथित फर्जीवाड़ा लंबे समय तक चलता रहा।
जांच जारी, कई बड़े नामों पर नजर
एसआईटी अब पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने में जुटी है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि इस कथित घोटाले में किन-किन अधिकारियों, ट्रांसपोर्टर्स, राइस मिलर्स और इथेनॉल प्लांट संचालकों की भूमिका रही। आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।