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“जमीन से जुड़ा प्रशासन: कलेक्टर वशिष्ठ का जैविक गांव भुम्मा में अलग अंदाज का दौरा”

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@ शुभम नांदेकर, पांढुर्णा। [The NewsBar]

सिर्फ दफ्तरों तक सीमित नहीं, बल्कि खेत-खलिहानों तक पहुंचकर बदलाव की तस्वीर गढ़ने की कोशिश—कुछ ऐसा ही नजर आ रहा है कलेक्टर नीरज कुमार वशिष्ठ के कामकाज में। इसी कड़ी में उन्होंने 17 अप्रैल को सहपरिवार ग्राम भुम्मा का दौरा किया, जहां जैविक खेती, बॉयोगैस और ग्रामीण पर्यटन की संभावनाओं ने एक नई उम्मीद जगाई है।

भुम्मा अब सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि “आत्मनिर्भर गांव” की दिशा में बढ़ता हुआ मॉडल बनता जा रहा है। यहां हर घर में पशुधन है और करीब 85 प्रतिशत परिवार बॉयोगैस का उपयोग कर रहे हैं, जिससे एलपीजी पर निर्भरता लगभग खत्म हो चुकी है। खेतों में भी रासायनिक खाद की जगह जैविक खाद का इस्तेमाल हो रहा है।

हल्दी से दुनिया तक: किसान की कहानी बनी पहचान

कलेक्टर वशिष्ठ ने किसान मटरूलाल डोंगरे के खेत का भ्रमण किया, जहां जैविक हल्दी की खेती और प्रोसेसिंग यूनिट को करीब से देखा।
डोंगरे ने बताया कि उनकी हल्दी ऑस्ट्रेलिया, पेरिस और जापान तक निर्यात हो रही है -यानी एक छोटे गांव से अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच।

कलेक्टर ने इस पहल को सराहा और किसानों को समूह बनाकर उत्पादन व मार्केटिंग करने की सलाह दी, ताकि उन्हें बेहतर दाम मिल सके और एक मजबूत “ग्रामीण ब्रांड” तैयार हो सके।

खेत से पर्यटन तक: नई सोच

भुम्मा की प्राकृतिक सुंदरता और जामसांवली व अर्द्धनारिश्वर मंदिर के नजदीक होने को देखते हुए कलेक्टर ने यहां होम स्टे विकसित करने का सुझाव दिया।
उनका मानना है कि खेती के साथ-साथ ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देकर किसानों की आय को कई गुना बढ़ाया जा सकता है।

हर खेत में नवाचार

दौरे के दौरान कलेक्टर ने

  • धनवत गोहिते के खेत में मूंगफली, मूंग, मक्का और गोभी की खेती
  • प्रहलाद गोहिते के खेत में तरबूज उत्पादन
  • और बॉयोगैस संयंत्रों का भी निरीक्षण किया

यहां हर किसान अपनी क्षमता के अनुसार नवाचार करता नजर आया।

जमीन पर उतरती योजनाएं

उप संचालक कृषि जितेन्द्र कुमार सिंह ने किसानों से संवाद कर जैविक खेती को बढ़ावा देने की बात कही और उत्पादों को जैविक हाट बाजार तक पहुंचाने की अपील की।

एक अलग संदेश

कलेक्टर वशिष्ठ का यह दौरा सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि एक संदेश भी है –
कि अगर प्रशासन जमीन पर उतरकर किसानों के साथ खड़ा हो, तो गांव खुद अपने विकास का रास्ता बना सकता है।

भुम्मा की कहानी यह बताती है कि सही दिशा, मेहनत और नवाचार के साथ गांव भी आत्मनिर्भर भारत की मजबूत नींव बन सकते हैं।

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