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मप्र फर्जी डॉक्टर घोटाला, संजीवनी क्लिनिकों में 50 से अधिक जाली डिग्रियों की आशंका, सरगना गिरफ्तार

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THE NewsBar | दमोह। मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य महकमे में उस समय हड़कंप मच गया जब राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत संचालित होने वाले ‘संजीवनी क्लिनिकों’ में फर्जी एमबीबीएस (MBBS) डिग्री के सहारे नौकरी पाने वाले एक बड़े रैकेट का खुलासा हुआ। दमोह पुलिस ने इस पूरे नेटवर्क के मुख्य सरगना हीरा सिंह कौशल को भोपाल से गिरफ्तार कर लिया है। शुरुआती जांच में आशंका जताई जा रही है कि प्रदेश भर में 50 से अधिक लोग इसी तरह फर्जी डिग्रियों के सहारे मरीजों की जान से खिलवाड़ कर डॉक्टर बने बैठे हैं।

भोपाल से दबोचा गया मुख्य सरगना, 2 दिन की रिमांड बढ़ी मामले की गंभीरता को देखते हुए दमोह पुलिस की विशेष टीम ने दबिश देकर कोहेफिजा हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी (भोपाल) निवासी मुख्य सरगना हीरा सिंह कौशल (45 वर्ष) को गिरफ्तार किया है। हीरा सिंह ही इस पूरे जाली डिग्री नेटवर्क का संचालन कर रहा था। इस मामले में अब तक दमोह, जबलपुर और भोपाल से चार गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। इससे पहले पकड़े गए तीन आरोपियों की पुलिस रिमांड खत्म होने पर उन्हें न्यायालय में पेश किया गया था, जहाँ से पुलिस ने पूछताछ के लिए उनकी 2 दिन की और रिमांड हासिल की है।

ग्वालियर-भोपाल के डॉक्टरों से जुड़ा था जाल, ऐसे शुरू हुई धोखाधड़ी पुलिस जांच में सामने आया है कि सरगना हीरा सिंह के संपर्क में सबसे पहले ग्वालियर और भोपाल के कुछ डॉक्टर आए थे, जिनके माध्यम से फर्जी एमबीबीएस डिग्री बनाने का यह काला कारोबार शुरू हुआ। गिरोह ने सबसे पहले मुरैना निवासी अजय मौर्य की फर्जी डिग्री तैयार की थी। इसके बाद अजय मौर्य के जरिए ही ग्वालियर निवासी कुमार सचिन यादव और सीहोर निवासी राजपाल गौर ने इस नेटवर्क से संपर्क किया और जाली दस्तावेज तैयार कराकर संजीवनी क्लिनिकों में बतौर डॉक्टर सरकारी नौकरी हासिल कर ली।

ओरिजिनल डॉक्टर का रजिस्ट्रेशन नंबर चुराकर किया खेल; रीवा-ग्वालियर कॉलेजों की जाली सील धोखाधड़ी का खुलासा तब हुआ जब मप्र मेडिकल काउंसिल, भोपाल के रजिस्ट्रार ने राजपाल गौर के दस्तावेजों की जांच की। जांच में उसका रजिस्ट्रेशन नंबर फर्जी पाया गया। आरोपी ने साल 2018 के पंजीयन क्रमांक MP 21961 में कूटरचना (छेड़छाड़) कर उसे 2023 का बना लिया था। असलियत में यह रजिस्ट्रेशन नंबर नर्मदापुरम के सिवनी मालवा में पदस्थ असली डॉक्टर अभिषेक यादव के नाम पर दर्ज है।

डॉ. अभिषेक यादव ने इस पर हैरानी जताते हुए कहा कि मेडिकल काउंसिल का पोर्टल बिना ओटीपी (OTP) के नहीं खुलता, ऐसे में उनका नंबर कैसे इस्तेमाल हुआ, यह बेहद गंभीर विषय है। पुलिस को आरोपियों के पास से विभिन्न विश्वविद्यालयों के जाली दस्तावेज मिले हैं, जिनमें रीवा मेडिकल कॉलेज और जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर के नामों का इस्तेमाल कर हूबहू फर्जी डिग्रियां तैयार की जा रही थीं।

टीम की मुस्तैदी और आगामी खुलासे की उम्मीद दमोह कोतवाली थाना प्रभारी (TI) मनीष कुमार ने बताया कि इस रैकेट से जुड़े अन्य संदिग्ध व्यक्तियों, फर्जी डॉक्टरों और दलालों की गिरफ्तारी के लिए अलग-अलग टीमें लगातार दबिश दे रही हैं। आने वाले दिनों में कई बड़े चिकित्सा संस्थानों और रसूखदारों के नाम सामने आ सकते हैं।

इस बड़े रैकेट का पर्दाफाश करने में कोतवाली निरीक्षक मनीष कुमार, उप निरीक्षक नितेश जैन, रोहित द्विवेदी, एएसआई अकरम खान, प्रधान आरक्षक अभिषेक चौबे, अजीत दुबे, महेश यादव, घासीराम, आरक्षक नरेंद्र पटेरिया और बृजेंद्र व्यास की मुख्य और सराहनीय भूमिका रही।

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