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फर्जी पत्रकारिता पर शिकंजा: ब्लैकमेलिंग और अवैध वसूली के आरोप में दो गिरफ्तार, एक फरार

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THE NewsBar | शुभम नांदेकर, छिंदवाड़ा/जुन्नारदेव।

पत्रकारिता की आड़ में कथित रूप से ब्लैकमेलिंग, अवैध वसूली और धमकी देने के आरोप में सिंगोड़ी पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए दो तथाकथित पत्रकारों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है, जबकि एक आरोपी अभी फरार है। पुलिस की इस कार्रवाई ने क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहे फर्जी पत्रकारों के नेटवर्क और उनकी गतिविधियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

पुलिस चौकी सिंगोड़ी प्रभारी पंकज राय के अनुसार लंबे समय से जनप्रतिनिधियों, शासकीय अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा शिकायतें मिल रही थीं कि कुछ लोग स्वयं को पत्रकार बताकर आरटीआई और सीएम हेल्पलाइन का सहारा लेते हुए लोगों को ब्लैकमेल करते हैं तथा झूठे प्रकरणों में फंसाने की धमकी देकर धन उगाही करते हैं।

मामले में रजोला निवासी अंकित साहू ने पुलिस अधीक्षक को शिकायत देकर बताया कि हिमांशु गोहिया, नीलेश प्रजापति और मनोज चंद्रवंशी ने उनसे कथित रूप से डेढ़ लाख रुपये की अवैध वसूली की तथा 70 हजार रुपये और देने का दबाव बनाया। जांच के बाद शिकायत सही पाए जाने पर पुलिस ने तीनों आरोपियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया।

व्हाट्सएप चैनलों के जरिए चल रहा था कथित खेल

पुलिस जांच में सामने आया कि आरोपी विभिन्न नामों से व्हाट्सएप चैनल संचालित कर समाचार प्रसारित करते थे। आरोप है कि वे समाचार प्रकाशित करने, शिकायतें लगाने और बदनाम करने की धमकी देकर लोगों पर दबाव बनाते थे। यहां तक कि पैसे नहीं देने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी जाती थी।

पुलिस ने 29 मई को हिमांशु गोहिया और नीलेश प्रजापति को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया। तीसरा आरोपी मनोज चंद्रवंशी फरार है, जिसकी तलाश जारी है।


बढ़ती बेरोजगारी और फर्जी पत्रकारों की फौज

यह मामला केवल तीन आरोपियों तक सीमित नहीं है। छिंदवाड़ा और पांढुर्णा जिलों में पिछले कुछ वर्षों में फर्जी पत्रकारों की संख्या तेजी से बढ़ी है। बेरोजगारी के बीच कई युवा बिना किसी प्रशिक्षण, अनुभव या पत्रकारिता के मूलभूत ज्ञान के स्वयं को पत्रकार घोषित कर रहे हैं।

पत्रकारिता समाज का चौथा स्तंभ मानी जाती है, लेकिन कुछ लोग इसे जनसेवा नहीं बल्कि कमाई का आसान जरिया समझ बैठे हैं। ऐसे कथित पत्रकार व्यापारियों, ठेकेदारों, पंचायत प्रतिनिधियों और सरकारी कर्मचारियों को निशाना बनाकर दबाव बनाने और धन उगाही करने का प्रयास करते हैं।

5 हजार रुपये में मिल रहे प्रेस कार्ड!क्षेत्र में यह भी चर्चा है कि कुछ छोटे अखबार, पोर्टल और वेबसाइट बिना किसी जांच-पड़ताल के केवल कुछ हजार रुपये लेकर प्रेस कार्ड जारी कर रहे हैं। इनमें से कई प्रकाशनों का स्थानीय स्तर पर कोई प्रसार नहीं है, न ही उनके पास वैध पंजीयन संबंधी दस्तावेज हैं। सोशल मीडिया और व्हाट्सएप चैनलों के माध्यम से स्वयं को पत्रकार बताने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है।


वास्तविक पत्रकारों की छवि हो रही धूमिल

कुछ लोगों की ऐसी गतिविधियों का सबसे बड़ा नुकसान उन ईमानदार और जिम्मेदार पत्रकारों को उठाना पड़ रहा है, जो वर्षों से जनहित के मुद्दे उठाकर समाज और प्रशासन के बीच सेतु का काम कर रहे हैं। फर्जी पत्रकारों की हरकतों के कारण पूरे मीडिया जगत की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।


शासन और प्रशासन को करना होगा सख्त नियमन

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रेस कार्ड जारी करने की प्रक्रिया को पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। साथ ही फर्जी पत्रकारिता, ब्लैकमेलिंग और अवैध वसूली के मामलों में त्वरित कार्रवाई कर ऐसे तत्वों पर लगाम लगाना आवश्यक है। अन्यथा पत्रकारिता के नाम पर चल रहा यह फर्जीवाड़ा समाज और लोकतंत्र दोनों के लिए चिंता का विषय बनता जाएगा।

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