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बंगाल से तेलंगाना तक बदली तस्वीर: बकरीद पर मुसलमानों ने उठाई गाय संरक्षण की आवाज, राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग तेज

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बंगाल की विडंबना – जब गाय बचाने निकले मुसलमान और बेचने को मजबूर हुए हिंदू

THE NewsBar | शुभम नांदेकर, विशेष रिपोर्ट।

कोलकाता/हैदराबाद/राजन्ना सिरसिला। बकरीद के अवसर पर इस वर्ष देश के कई हिस्सों से ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने गाय और गौसंरक्षण को लेकर बनी पारंपरिक राजनीतिक और सामाजिक धारणाओं को नई दिशा दे दी है। पश्चिम बंगाल से लेकर तेलंगाना के राजन्ना सिरसिला जिले तक मुस्लिम समुदाय के कई संगठनों, धर्मगुरुओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गाय संरक्षण की वकालत करते हुए उसे भारत का राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग उठाई है।

पश्चिम बंगाल में कोलकाता की ऐतिहासिक नखोदा मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद शफीक कासमी ने बकरीद से पहले मुस्लिम समुदाय से अपील की कि वे गाय की कुर्बानी से बचें और सामाजिक सौहार्द को प्राथमिकता दें। उन्होंने कहा कि इस्लाम में बकरे और भेड़ जैसे अन्य विकल्प मौजूद हैं, इसलिए कानून और सामाजिक संवेदनशीलता का सम्मान किया जाना चाहिए।

दिलचस्प बात यह रही कि मौलाना कासमी ने यह भी कहा कि यदि गोमांस का उपभोग पूरी तरह बंद हो जाए तो इसका आर्थिक असर सबसे अधिक उन हिंदू परिवारों पर पड़ेगा जो वर्षों से डेयरी और पशुपालन व्यवसाय से जुड़े हैं तथा बकरीद के दौरान पशु बिक्री पर निर्भर रहते हैं। इस बयान ने बंगाल में नई बहस को जन्म दिया है।

उधर तेलंगाना के राजन्ना सिरसिला जिले में बकरीद के जश्न के दौरान मुस्लिम संगठनों के सदस्यों ने सार्वजनिक रूप से तख्तियां लेकर प्रदर्शन किया और गाय को भारत का राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग उठाई। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि गाय भारतीय संस्कृति, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है, इसलिए उसे विशेष संवैधानिक संरक्षण मिलना चाहिए।

देशभर में यह मांग अब केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद, ऑल इंडिया मुस्लिम जमात, अजमेर दरगाह से जुड़े धर्मगुरु और कई अन्य मुस्लिम संगठन भी गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने तथा पूरे देश में एक समान कानून लागू करने की मांग कर चुके हैं। उनका तर्क है कि इससे गाय के नाम पर होने वाले विवादों और सामाजिक तनाव को कम करने में मदद मिल सकती है।

बकरीद के अवसर पर सामने आई यह तस्वीर इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि एक ओर देश के कई हिस्सों में मुस्लिम संगठन गाय संरक्षण और राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पशुपालन से जुड़े अनेक परिवार अपनी आजीविका और आर्थिक हितों को लेकर चिंतित दिखाई दे रहे हैं।

बदलती सोच का संकेत

बंगाल से तेलंगाना तक उभर रही यह आवाज केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक विमर्श का हिस्सा बनती जा रही है। बकरीद जैसे महत्वपूर्ण पर्व पर मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग द्वारा गाय संरक्षण और राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की मांग ने यह संकेत दिया है कि देश में इस विषय पर संवाद की दिशा बदल रही है। आने वाले समय में यह मुद्दा सामाजिक सौहार्द, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय नीति—तीनों स्तरों पर चर्चा का केंद्र बन सकता है।

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