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बाघ शिकार कांड: चार तस्कर गिरफ्तार, लेकिन वन सुरक्षा व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल

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THE NewsBar | शुभम नांदेकर, छिंदवाड़ा। राष्ट्रीय पशु बाघ के शिकार और उसके अंगों की तस्करी से जुड़े एक सनसनीखेज मामले का वन विभाग ने खुलासा किया है। कार्रवाई के दौरान चार आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके कब्जे से बाघ की खाल, खोपड़ी, चार पंजे, नाखून तथा अन्य अवशेष बरामद किए गए हैं। पूछताछ के आधार पर जंगल में दफन किए गए बाघ के अन्य अवशेष भी गड्ढा खोदकर निकाले गए। हालांकि इस कार्रवाई के बाद वन विभाग की सतर्कता की सराहना हो रही है, वहीं जंगलों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल भी खड़े हो गए हैं।

पूर्व वन मंडल अधिकारी के अनुसार, आरोपियों ने करीब एक माह पहले बाघ का शिकार किया था। बाघ की खाल और अन्य अंगों के लिए पहले एक करोड़ रुपये की मांग की गई थी, लेकिन बाद में 30 लाख रुपये में सौदा तय होने की जानकारी सामने आई है। वन विभाग ने जाल बिछाकर आरोपियों को गिरफ्तार किया और बड़ी तस्करी को अंजाम देने से पहले ही पूरे मामले का पर्दाफाश कर दिया।

सौदागर बनकर पहुंचे वन विभाग के लोग

वन विभाग को जैसे ही बाघ के शिकार और उसके अवशेष बेचने की सूचना मिली, विभाग ने विशेष रणनीति तैयार की। कुछ लोगों को खरीदार बनाकर आरोपियों के संपर्क में भेजा गया। सौदा तय होते ही वन अमले ने कार्रवाई करते हुए आरोपियों को धर दबोचा और उनके कब्जे से बाघ के अवशेष बरामद कर लिए।

पूछताछ में मिली जानकारी के आधार पर वन विभाग की टीम ने के जंगल में खुदाई कर बाघ के अन्य अवशेष भी बरामद किए। बताया जा रहा है कि शिकार के बाद साक्ष्य मिटाने के उद्देश्य से अवशेषों को जमीन में दफना दिया गया था।

गिरफ्तार आरोपी

  • दानशा उइके (63 वर्ष), जामुनपानी, हर्रई
  • गौतम धुर्वे (53 वर्ष), छिंदा परतापुर, हर्रई
  • हरिराम इनवाती (68 वर्ष), बांका, हर्रई
  • सूखदास उइके (44 वर्ष), पटनिया, हर्रई

कार्रवाई में एसडीओ और रेंजर सहित वन विभाग की टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही। डीएफओ ने टीम को पुरस्कृत करने की घोषणा भी की है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी बाकी

बाघ शिकार मामले के खुलासे के साथ ही वन सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। यदि बाघ का शिकार करीब एक माह पहले हुआ था, तो वन विभाग और वन रक्षकों को इसकी भनक समय रहते क्यों नहीं लगी? आखिर जंगलों में गश्त और निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है..?

स्थानीय स्तर पर लंबे समय से जंगलों में अवैध गतिविधियों की शिकायतें सामने आती रही हैं। कई क्षेत्रों में अवैध कटाई, वन संपदा की चोरी तथा वन्यजीवों के शिकार की घटनाओं को लेकर चर्चा होती रही है। ऐसे में बाघ जैसे संरक्षित वन्यजीव का शिकार होना वन सुरक्षा तंत्र की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है।

वन्यजीव संरक्षण से जुड़े जानकारों का मानना है कि जंगलों में कैमरा ट्रैप, ड्रोन निगरानी, मुखबिर तंत्र और नियमित गश्त को और मजबूत करने की जरूरत है। केवल शिकार के बाद आरोपियों को पकड़ लेना पर्याप्त नहीं माना जा सकता, बल्कि ऐसी घटनाओं को होने से पहले रोकना भी उतना ही आवश्यक है।

जांच का विषय बनी पूरी व्यवस्था

यह मामला अब केवल चार आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रह गया है। जांच एजेंसियों के सामने यह भी चुनौती है कि इस तस्करी नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल थे तथा बाघ के शिकार जैसी गंभीर घटना को रोकने में कहीं कोई चूक तो नहीं हुई।

वन विभाग की कार्रवाई ने एक बड़े वन्यजीव तस्करी गिरोह का पर्दाफाश जरूर किया है, लेकिन इस घटना ने जंगलों और वन्यजीवों की सुरक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न भी लगा दिया है। बाघ शिकार कांड ने यह बहस फिर तेज कर दी है कि देश के जंगलों और दुर्लभ वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्थाएं जमीनी स्तर पर आखिर कितनी कारगर साबित हो रही हैं।

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