The NewsBar | शुभम नांदेकर, छिंदवाड़ा।
छिंदवाड़ा–पांढुर्णा क्षेत्र के सांसद आज अपना जन्मदिन मना रहे हैं। इस मौके पर दोनों जिलों में समर्थकों, भाजपा कार्यकर्ताओं, व्यापारिक संगठनों और आम नागरिकों की ओर से उन्हें लगातार शुभकामनाएं मिल रही हैं। लेकिन इस दिन को खास बनाती है उनकी वह कहानी, जो सिर्फ एक जन्मदिन नहीं बल्कि जिद, बदलाव और संघर्ष की मिसाल है।

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साधारण शुरुआत से संसद तक का सफर
आज भले ही लोग उन्हें एक सांसद के रूप में जानते हों, लेकिन कुछ साल पहले तक वे एक सामान्य कारोबारी थे। राजनीति से उनका गहरा जुड़ाव नहीं था, बल्कि वे लंबे समय तक की विचारधारा से प्रभावित रहे और के करीबी माने जाते थे।
व्यवसाय के क्षेत्र में उन्होंने ऑटोमोबाइल सेक्टर में अपनी पहचान बनाई और जैसी बड़ी कंपनी के साथ काम करते हुए क्षेत्र में मजबूत नेटवर्क तैयार किया।

एक फैसले ने बदली दिशा
करीब 2010 के आसपास एक ऐसा मोड़ आया, जिसने उनकी पूरी दिशा बदल दी। उन्होंने महसूस किया कि छिंदवाड़ा की राजनीति एक ही केंद्र के आसपास सिमटी हुई है, जहां नए नेतृत्व के लिए जगह सीमित है। यही वह समय था जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थामने का निर्णय लिया।
यह फैसला सिर्फ पार्टी बदलने का नहीं था, बल्कि खुद को नए सिरे से स्थापित करने की चुनौती भी था।

युवा मोर्चा से शुरू हुआ असली संघर्ष
भाजपा में शामिल होने के बाद उन्हें युवा मोर्चा में जिम्मेदारी मिली। यहीं से उनके राजनीतिक सफर की असली शुरुआत हुई। संगठन में सक्रियता, जमीनी स्तर पर काम और लगातार लोगों के बीच मौजूदगी ने उन्हें अलग पहचान दिलानी शुरू की।
उन्होंने यह साबित किया कि राजनीति केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास और भरोसे से आगे बढ़ती है।

जुनून और भरोसे ने दिलाया मुकाम
राजनीति में अक्सर धन और प्रभाव को सफलता का जरिया माना जाता है, लेकिन बंटी साहू का सफर इस धारणा से अलग नजर आता है। उन्होंने अपनी छवि को धीरे-धीरे एक समर्पित कार्यकर्ता और संगठन के भरोसेमंद चेहरे के रूप में बदला।
युवा मोर्चा अध्यक्ष से लेकर जिला भाजपा अध्यक्ष और फिर सांसद बनने तक का सफर आसान नहीं था। करीब 13 वर्षों में उन्होंने खुद को उस स्तर तक पहुंचाया, जहां पार्टी ने भी उन पर पूरा विश्वास जताया।

2024 में मिली बड़ी जिम्मेदारी
लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा ने उन्हें छिंदवाड़ा से उम्मीदवार बनाया। यह फैसला केवल राजनीतिक समीकरण नहीं, बल्कि उनके लंबे संघर्ष और संगठन में निभाई भूमिका का परिणाम था। पार्टी ने पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ा और अंततः बंटी साहू सांसद बने।
एक संदेश, जो राजनीति से परे है
उनकी कहानी सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है। यह उन युवाओं के लिए एक संदेश भी है, जो कठिन परिस्थितियों में अपनी पहचान बनाना चाहते हैं।
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जन्मदिन पर यही कहानी उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाती है- जहां पद नहीं, बल्कि उस तक पहुंचने का सफर ज्यादा मायने रखता है।
