HighLights
- सुप्रीम कोर्ट के निर्देश: 1 सितंबर 2025 तक शिक्षकों को TET पास करना अनिवार्य
- 1995 से 2010 के बीच नियुक्त करीब डेढ़ लाख शिक्षकों की नौकरी पर संकट
- शिक्षक संगठनों की दलील: पुराने शिक्षकों पर परीक्षा थोपना मौलिक अधिकार का हनन
प्रदेश के लगभग डेढ़ लाख प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षकों की नौकरी पर पात्रता की तलवार लटक रही है। सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की व्यवस्था के निर्देश दिए हैं।
प्रतिनिधि, भोपाल। [The NewsBar] प्रदेश के लगभग डेढ़ लाख प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षकों की नौकरी पर पात्रता की तलवार लटक रही है। सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की व्यवस्था के निर्देश दिए हैं। उधर, शिक्षक भविष्य पर संकट को देखते हुए आंदोलन तो कर ही रहे हैं, सुप्रीम कोर्ट भी राहत की मांग लेकर पहुंच गए हैं। शिक्षक संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका भी लगा दी है। उनका कहना है कि 1995 के बाद चयनित हुए शिक्षकों की पात्रता परीक्षा विभाग लेगा, जबकि उस समय उनकी नियुक्ति शासन के भर्ती नियमों के आधार पर ही हुई है। तब सरकार ने पात्रता परीक्षा क्यों नहीं ली।
2013 से पहले के शिक्षक दायरे में
प्रदेश में यह परीक्षा 2013 से शुरू हुई। अब इससे पहले के भर्ती शिक्षकों को पात्रता परीक्षा देना अनिवार्य किया गया है। प्रदेश में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) 2011 में लागू हुआ। 2013 से यह पात्रता परीक्षा ली जा रही है, जबकि शिक्षकों की भर्ती 1998, 2001, 2003, 2006, 2009 और 2010 में भी हुई। उस समय शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित नहीं की गई थी, क्योंकि प्रविधान नहीं था। अब यदि परीक्षा होती है तो उसके दायरे में लगभग डेढ़ लाख शिक्षक आएंगे। शिक्षक इसके विरोध में 11 अप्रैल को विधायकों व मंत्रियों को ज्ञापन देंगे। इसके बाद 18 अप्रैल को परिवार सहित भोपाल में प्रदर्शन करेंगे। हालांकि बुधवार को मप्र शिक्षक संघ के प्रतिनिधिमंडल से स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने कहा कि सरकार शिक्षकों के साथ है। विभागीय अधिकारियों को नई दिल्ली भेजा जाएगा और पुनर्विचार याचिका लगाई जाएगी।
विभाग का आदेश और सुप्रीम कोर्ट की समय-सीमा
विभाग द्वारा जारी आदेश में यह उल्लेखित किया गया कि आरटीई 2009 के अनुसार प्राथमिक एवं माध्यमिक शालाओं के अध्यापकों को पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करने के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी आदेश एक सितंबर 2025 के अनुसार प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों में अध्यापन करने वाले अध्यापकों को आगामी दो वर्षों में शिक्षक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा।
पुनर्विचार याचिका के मुख्य बिंदु: मौलिक अधिकारों का हवाला
याचिका में कई बिंदुओं का उल्लेख किया गया है…
- अनुच्छेद 21 का उल्लंघन: इसमें 25 से 30 वर्ष तक की सेवा देने वाले कर्मचारियों के साथ यह व्यवहार अनुचित एवं अन्यायपूर्ण है और अनुच्छेद 21 में उसे प्राप्त जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
- समानता के अधिकार का उल्लंघन: टीईटी की परीक्षा उन लोगों से ली जाती है जो शिक्षक बनने की पात्रता हासिल करना चाहते हैं और अब टेट की परीक्षा के लिए उन्हें बाध्य किया जा रहा है जो पूर्व से ही शिक्षक हैं। यह करना समानता के अधिकार और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
एनसीटीई की अधिसूचना: भारत सरकार का राजपत्र दिनांक 23 अगस्त 2010 में एनसीटीई की अधिसूचना के पैरा 4 में उल्लेखित प्रविधानों के अनुसार 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों की नियुक्ति उस समय पर लागू नियमों के आधार पर हुई है।
केके द्विवेदी (संचालक, लोक शिक्षण संचालनालय): इस मामले में शासन के निर्देश पर आगे की तैयारी की जा रही है। अगर परीक्षा होगी तो प्रदेश के करीब 70 हजार शिक्षक शामिल होंगे।
जगदीश यादव (प्रांताध्यक्ष, राज्य शिक्षक संघ): इस आदेश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की गई है। आरटीई के लागू होने के बाद जितनी भर्तियां हुई हैं, सभी ने पात्रता परीक्षा दी है। 2009 के पहले के शिक्षकों को इस दायरे में नहीं लेना चाहिए।
डॉ. क्षत्रवीर सिंह राठौर (प्रदेश अध्यक्ष, मध्य प्रदेश शिक्षक संघ): शासन की ओर से न्यायालय में पुनर्विचार याचिका लगाने का प्रस्ताव भेजा जा रहा है। आरटीई लागू होने के पहले तक 1998 से 2005 तक के भर्ती शिक्षकों को इस परीक्षा से मुक्त रखा जाए।
उपेंद्र कौशल (कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष, शासकीय शिक्षक संगठन): सुप्रीम कोर्ट में याचिका दर्ज हुई है इसमें लोक शिक्षण भोपाल द्वारा टीईटी परीक्षा आदेश और 2009 आरटीई एक्ट से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को टीईटी परीक्षा से मुक्त रखने की मांग की गई है।