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प्रेस की आज़ादी पर संकट गहराया: 2026 में भारत 157वें स्थान पर, RSF रिपोर्ट में बड़ी गिरावट

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The NewsBar |  शुभम नांदेकर.. . ✍🏻

दुनिया भर में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ माने जाने वाले मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। (RSF) द्वारा जारी World Press Freedom Index 2026 में भारत की रैंकिंग गिरकर 157वें स्थान पर पहुंच गई है। पिछले वर्ष 2025 में भारत 151वें स्थान पर था, यानी इस बार 6 पायदान की गिरावट दर्ज हुई है।

📊 वैश्विक तस्वीर: हालात क्यों बिगड़ रहे हैं?

RSF की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के 60% से अधिक देशों (180 में से 110) में प्रेस की आज़ादी कमजोर हुई है। कई देशों में पत्रकारों को अपराधियों की तरह ट्रीट किया जा रहा है और स्वतंत्र पत्रकारिता पर दबाव बढ़ता जा रहा है।

🇮🇳 भारत की स्थिति: “बहुत गंभीर” श्रेणी में

भारत को इस बार भी “Very Serious” (बहुत गंभीर) कैटेगरी में रखा गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यहां मीडिया पर कई तरह के दबाव बढ़े हैं:

  • पत्रकारों पर कानूनी कार्रवाई और केस बढ़ना
  • मानहानि और राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों का इस्तेमाल
  • मीडिया संस्थानों पर राजनीतिक और कॉरपोरेट प्रभाव
  • स्वतंत्र रिपोर्टिंग में सुरक्षा और दबाव की समस्या

रिपोर्ट में “judicial harassment” यानी न्यायिक उत्पीड़न को भी बड़ा कारण बताया गया है, जहां कानूनों का उपयोग मीडिया को नियंत्रित करने के लिए किया जा रहा है।

🌏 अन्य देशों से तुलना

भारत की स्थिति कई देशों से पीछे रही:

  • पाकिस्तान – 153वां स्थान
  • जॉर्जिया – 135वां स्थान
  • इज़राइल – 116वां स्थान
  • कंबोडिया – 151वां स्थान
  • म्यांमार – 166वां स्थान
  • चीन – 178वां स्थान
  • रूस – 172वां स्थान

चौंकाने वाली बात यह है कि भारत कुछ पड़ोसी देशों से भी पीछे है।

🏆 कौन आगे, कौन पीछे?

  • नॉर्वे लगातार 10वें साल भी सूची में पहले स्थान पर बना हुआ है
  • इरिट्रिया सबसे निचले स्थान पर है
  • जापान ने इस बार अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए 62वां स्थान हासिल किया

📌 निष्कर्ष

RSF की यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि दुनिया भर में मीडिया की स्वतंत्रता दबाव में है, और भारत में भी हालात चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं। पत्रकारों की सुरक्षा, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और संस्थागत स्वतंत्रता जैसे मुद्दे अब पहले से ज्यादा अहम हो गए हैं।

👉 कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट सिर्फ रैंकिंग नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सेहत का आईना है—जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है।

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