विज्ञापन ₹ ☎️ 8827666688

पेंच बफर जोन में मिला जला हुआ संदिग्ध कंकाल: बिना सैंपल और फॉरेंसिक जांच के ‘मवेशी’ घोषित करने पर उठे सवाल, मामला दबाने की कोशिश

Share:

Join Whatsapp group

» घने जंगल में मिले अवशेषों को लेकर वन विभाग पर गंभीर आरोप, ग्रामीणों ने की उच्च स्तरीय जांच और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग

THE NewsBar | विशेष रिपोर्ट  सतीश डोंगरे, बिछुआ (छिंदवाड़ा)

पेंच नेशनल पार्क के बफर जोन अंतर्गत बंधान बीट के थोटामाल क्षेत्र के घने जंगल में मिले जले हुए संदिग्ध कंकाल ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि बिना किसी वैज्ञानिक जांच, सैंपलिंग या फॉरेंसिक प्रक्रिया अपनाए वन विभाग के अधिकारियों ने अवशेषों को जल्दबाजी में “मवेशी” बताकर मामले को शांत करने का प्रयास किया।

घटना सामने आने के बाद अब पूरे मामले में पारदर्शी जांच की मांग तेज हो गई है।

तेंदूपत्ता तोड़ने पहुंचे ग्रामीणों ने देखा संदिग्ध स्थल

जानकारी के अनुसार, सोमवार सुबह बंधान बीट के सिंगारदीप सर्किल क्षेत्र में ग्रामीण तेंदूपत्ता संग्रह के लिए जंगल पहुंचे थे। इसी दौरान उन्हें जंगल के अंदर एक स्थान पर बड़ी मात्रा में राख और जले हुए हड्डीनुमा अवशेष दिखाई दिए।

ग्रामीणों ने तत्काल इसकी सूचना वन विभाग को दी। सूचना मिलने पर डिप्टी रेंजर और वनरक्षक मौके पर पहुंचे तथा वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दी गई।

लेकिन यहीं से पूरे मामले ने सवालों का रूप ले लिया।

बिना जांच के “मवेशी” घोषित करने पर विवाद

ग्रामीणों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि घटना स्थल से न तो किसी प्रकार के सैंपल लिए गए और न ही फॉरेंसिक या पशु चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया। इसके बावजूद विभागीय स्तर पर इसे “मवेशी के अवशेष” बताने की बात सामने आई।

नियमों के अनुसार किसी भी संदिग्ध जैविक अवशेष की पहचान के लिए फॉरेंसिक जांच, डीएनए परीक्षण या वेटरनरी विशेषज्ञ की राय आवश्यक मानी जाती है।

ऐसे में सवाल उठ रहा है-

जब सैंपल ही नहीं लिए गए, तो अवशेषों को मवेशी घोषित करने का आधार क्या है?

सवालों के घेरे में वन विभाग

इस पूरे मामले में कई ऐसे बिंदु सामने आए हैं जो जांच की मांग कर रहे हैं-

1. घने जंगल के बीच मवेशी कैसे पहुंचा?
घटना स्थल मुख्य सड़क से लगभग दो किलोमीटर अंदर बताया जा रहा है। रास्ता पहाड़ी, पथरीला और वन्यजीवों की मौजूदगी वाला क्षेत्र है। ऐसे स्थान तक किसी मवेशी का पहुंचना अपने आप में सवाल खड़ा करता है।

2. यदि मवेशी था, तो उसे जलाने की जरूरत क्यों पड़ी?
अगर वास्तव में यह मवेशी का शव था, तो उसे जंगल के भीतर जलाने वाला कौन था और किस उद्देश्य से जलाया गया?

3. क्या किसी वन्यजीव के शिकार के सबूत मिटाए गए?
ग्रामीणों का संदेह है कि कहीं किसी संरक्षित वन्यजीव का अवैध शिकार कर पहचान छिपाने के लिए अवशेष नष्ट करने का प्रयास तो नहीं किया गया।

4. डॉग स्क्वाड और फॉरेंसिक टीम क्यों नहीं बुलाई गई?
यदि मामला संदिग्ध था, तो वैज्ञानिक जांच एजेंसियों को तत्काल क्यों नहीं जोड़ा गया?

5. मौके का पंचनामा और फोटोग्राफी क्यों नहीं हुई?
ग्रामीणों का दावा है कि घटना स्थल पर प्रारंभिक स्तर पर दस्तावेजी साक्ष्य संकलन की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दी।

“दिसंबर में जलाया गया था” दावे पर भी सवाल

स्थानीय लोगों का कहना है कि विभागीय स्तर पर यह बात कही जा रही है कि संबंधित अवशेष दिसंबर माह के हैं।

लेकिन ग्रामीण पूछ रहे हैं—

यदि घटना छह माह पुरानी थी, तो बारिश, तेज हवा और मौसम परिवर्तन के बाद भी राख और अवशेष लगभग उसी स्थिति में कैसे बने रहे?

यह बिंदु भी जांच का विषय बन गया है।

मीडिया से दूरी, अधिकारियों की चुप्पी

मामले की गंभीरता को देखते हुए जब पत्रकारों ने वन विभाग के अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की, तो कथित तौर पर कई अधिकारियों के फोन बंद मिले और कार्यालय में भी स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी।

शाम तक विभाग की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आने से लोगों में और अधिक संदेह पैदा हो गया।

ग्रामीणों की मांग – स्वतंत्र एजेंसी से हो जांच

स्थानीय ग्रामीणों ने पेंच नेशनल पार्क प्रबंधन, जिला प्रशासन और उच्च अधिकारियों से मांग की है कि-

  • घटनास्थल से वैज्ञानिक तरीके से सैंपल लिए जाएं
  • फॉरेंसिक एवं डीएनए जांच कराई जाए
  • स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच हो
  • यदि किसी स्तर पर लापरवाही या तथ्य छिपाने का प्रयास हुआ हो तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए

अब सबसे बड़ा सवाल…

बिना सैंपल, बिना फॉरेंसिक रिपोर्ट और बिना वैज्ञानिक पुष्टि के आखिर किस आधार पर अवशेषों को “मवेशी” बताया गया?

क्या यह सामान्य मामला है, या किसी बड़े सच को दबाने की जल्दबाजी?

अब इस पूरे प्रकरण में निष्पक्ष जांच ही सच्चाई सामने ला सकती है।

error: Copy not allowed