[The NewsBar] डिजिटल पेमेंट का सबसे बड़ा माध्यम बन चुका अब एक नए सवाल के केंद्र में है—क्या इसके इस्तेमाल पर शुल्क (चार्ज) लगाया जाना चाहिए? एक ताजा सर्वे ने इस मुद्दे पर लोगों की राय को साफ कर दिया है, और नतीजे चौंकाने वाले हैं।
आज के समय में UPI लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। चाय की दुकान से लेकर बड़े शोरूम तक, हर जगह कुछ ही सेकंड में पेमेंट संभव है—वो भी बिना किसी अतिरिक्त लागत के। लेकिन अगर इस सुविधा पर फीस लगाई गई, तो यूजर्स का रुख पूरी तरह बदल सकता है।
📊 सर्वे में क्या सामने आया?
देश के 376 जिलों में 39,000 से ज्यादा यूजर्स (68% पुरुष, 32% महिलाएं) पर किए गए सर्वे में पाया गया कि:
- 75% लोगों ने साफ कहा: अगर UPI ट्रांजैक्शन पर कोई चार्ज लगा, तो वे इसका इस्तेमाल बंद कर देंगे
- 9% लोग: तय (फिक्स) ट्रांजैक्शन फीस के पक्ष में
- 3% लोग: ट्रांजैक्शन वैल्यू के प्रतिशत के आधार पर फीस चाहते हैं
- 13% लोग: एक सीमा तक फिक्स फीस, उसके बाद प्रतिशत आधारित शुल्क के पक्ष में
💳 व्यापारियों का रवैया भी सामने आया
सर्वे में यह भी पूछा गया कि पिछले 12 महीनों में कितनी बार दुकानदारों ने UPI से पेमेंट लेने से मना किया:
- 43% लोगों ने कहा—कभी नहीं हुआ
- 18%—1-2 बार
- 20%—3-4 बार
- 8%—5-10 बार
- 8%—10-20 बार
- 3%—20 बार से ज्यादा
🔍 क्या है चिंता की वजह?
2016 में शुरू हुआ UPI आज भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका है। इसकी सबसे बड़ी ताकत है—फ्री और आसान ट्रांजैक्शन। ऐसे में अगर इस पर शुल्क लगाया जाता है, तो बड़े स्तर पर यूजर्स इसके विकल्प खोज सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जहां एक तरफ सिस्टम को बनाए रखने के लिए लागत आती है, वहीं दूसरी तरफ यूजर्स की फ्री सर्विस की आदत भी एक बड़ी चुनौती बन गई है। अगर संतुलन नहीं बनाया गया, तो डिजिटल पेमेंट सिस्टम की ग्रोथ पर असर पड़ सकता है।
UPI सिर्फ एक पेमेंट सिस्टम नहीं, बल्कि लोगों की आदत बन चुका है। लेकिन सर्वे के आंकड़े साफ संकेत देते हैं—चार्ज लगा तो यूजर्स का भरोसा डगमगा सकता है। ऐसे में सरकार और संबंधित संस्थाओं को कोई भी फैसला बेहद सोच-समझकर लेना होगा।