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NEET Paper Leak Suicide: नीट कैंडीडेट ने की आत्महत्या, परीक्षा रद्द होने के बाद तनाव में था छात्र, आंसुओं में डूबी डॉक्टरी की ‘Inside Story’

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वजह वही पुरानी और घातक – पेपर लीक। 2024 की कड़वी यादें अभी धुंधली भी नहीं हुई थीं कि 2026 के इस महा-लीक ने यह साबित कर दिया कि देश की सबसे बड़ी परीक्षा प्रणाली का सुरक्षा घेरा किसी कागज की दीवार से ज्यादा कुछ नहीं है।

THE NewsBar | शुभम नांदेकर, NEET Paper Leak Suicide: उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में नीट परीक्षा से जुड़ा एक दर्दनाक घटना सामने आई है। जिले के नौरंगाबाद स्थित गंगोत्री नगर में एक नीट अभयर्थी का शव कमरे में फंदे से लटना मिला। परिजनों का कहना है कि नीट पेपर लीक और परीक्षा रद्द होने के बाद छात्र मानसिक तनाव में चल रहा था।

तीसरी बार दी थी नीट परीक्षा
मृतक छात्र की पहतान रितिक मिश्रा के रूप में हुई है, जो धौरहरा क्षेत्र के कटौली गांव का रहने वाला था। रितिक हाल ही में कानपुरक में नीट टेस्ट देकर लौटा था। पिता अनूप मिश्रा ने बताया कि रितिक ने इस बार तीसरा बार नीट की परीक्षा दी थी। इससे पहले उसके अंक कम आए थे, लेकिन इस बार उसे अच्छे परिणाम की उम्मीद थी। पेपर लीक औऱ परीक्षा रद्द होने के खबर के बाद वह काफी परेशान रहने लगा था।

परिजन लगातार समझाते रहे
परिवार के अनुसार रितिक पिछले कुछ दिनों से मानसिक रूप से काफी दबाव में था। परिजन उसे लगातार समझाने और हिम्मत देने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उसने आत्मघाती कदम उठा लिया। घटना के बाद परिवार में कोहराम मचा हुआ है। घटना के बाद इलाके के लोग भी स्तब्ध नजर आए। पड़ोसिों का कहना है कि रितिक पढ़ाई में काफी तेज था औऱ डॉक्टर बनने का सपना देख रहा था। किसी को अंदाजा नहीं था कि वह इतना बड़ा कदम उठा लेगा।

छात्र की मौत की खबर के बाद स्थानीय लोगों में नाराजगी देखने के मिली। कई लोग नीट परीक्षा आयोजित कराने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी को लेकर नाराजगी जताते दिखे।

परीक्षा में असफल होने पर बच्चे अकेलापन और डिप्रेशन महसूस करते हैं, जिसका मुख्य कारण तुलना और उम्मीदों का दबाव है। माता-पिता को ऐसे समय में शांत रहकर बच्चों को भावनात्मक सहारा देना चाहिए और उनकी बात सुननी चाहिए।

नेशनल टॉपर का दर्द: “रिदम टूट गया है, शून्य से शुरुआत करना थकाऊ है”

यह सिर्फ एक खबर नहीं, एक मानवीय त्रासदी है। जमशेदपुर जैसे छोटे शहर में रहने वाली 12वीं साइंस की नेशनल टॉपर शांभवी तिवारी के शब्दों में – “नीट के बाद मैं रिलैक्स मोड में थी, लेकिन अब फिर से शून्य से तैयारी शुरू करना मानसिक रूप से थकाऊ है। पूरे देश की परीक्षा रद्द करने से उन छात्रों का मनोबल टूटता है जिन्होंने ईमानदारी से मेहनत की। पढ़ाई का जो रिदम था, वह अब पूरी तरह बिखर चुका है। परीक्षा के दौरान केंद्र पर तकनीकी समस्याओं के कारण चार प्रश्न छूटे, इसके बावजूद 664 अंक आ रहे थे। विश्वास था कि इस स्कोर पर एम्स (AIIMS) में दाखिला मिल जाएगा।”

शांभवी अकेली नहीं है। 30 लाख छात्रों का मतलब है – कम से कम 1 करोड़ लोगों का मानसिक और आर्थिक तनाव। कई माता-पिता ने जमीन गिरवी रखकर कोचिंग की फीस भरी थी। अब दोबारा परीक्षा का मतलब है – दोबारा फॉर्म, दोबारा यात्रा का खर्च और फिर से वही अनिश्चितता। यह केवल परीक्षा रद्द होना नहीं है, यह एक पूरी पीढ़ी का भरोसा ‘कैंसिल’ होना है।

क्या है NTA? इतिहास और कार्यप्रणाली का पेचीदा जाल
आइए पहले ये जानते है कि इस परीक्षा को कराने वाली एजेंसी है क्या? नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की स्थापना 2017 में एक ‘स्वायत्त’ (Autonomous) संस्था के रूप में की गई थी। मकसद था – देश में पारदर्शिता के साथ उच्च गुणवत्ता वाली प्रवेश परीक्षाएं कराना।

क्यों बनी थी NTA? इससे पहले सीबीएसई (CBSE) मेडिकल प्रवेश परीक्षाएं कराता था। लेकिन परीक्षाओं के बढ़ते बोझ और तकनीकी जटिलताओं को देखते हुए सरकार ने एक समर्पित एजेंसी बनाई।

कैसे काम करती है प्रणाली? NTA की कार्यप्रणाली बेहद जटिल है। इसमें पेपर सेटर्स, मॉडरेटर्स, प्रिंटिंग प्रेस, लॉजिस्टिक पार्टनर्स और हजारों परीक्षा केंद्र शामिल होते हैं। पेपर को ‘मल्टी-लेयर’ सुरक्षा में रखा जाता है। पेपर जिला मुख्यालयों के ‘ट्रेजरी’ (खजाने) या बैंकों के स्ट्रॉन्ग रूम में रखे जाते हैं और परीक्षा के ठीक पहले केंद्रों तक पहुंचते हैं।

चूक कहां होती है?
विशेषज्ञों का मानना है कि NTA की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी ‘आउटसोर्सिंग’ है। एजेंसी के पास अपना पर्याप्त स्टाफ और इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। वह पेपर प्रिंटिंग से लेकर कंप्यूटर सेंटर्स तक के लिए बाहरी वेंडर्स पर निर्भर है। जब कड़ियां इतनी ज्यादा होती हैं, तो किसी एक कड़ी का कमजोर होना पूरे चेन को तोड़ देता है।

2024 का ‘मास्टर प्लान’ और 2026 की नाकामी
2024 में नीट को लेकर जो बवाल हुआ था, वह भारतीय शिक्षा इतिहास का काला अध्याय था। ग्रेस मार्क्स, एक ही सेंटर से कई टॉपर्स और पेपर लीक के गंभीर आरोपों ने सुप्रीम कोर्ट तक को हस्तक्षेप करने पर मजबूर कर दिया था। तब सरकार ने वादा किया था कि ‘रिफॉर्म्स’ किए जाएंगे।

लेकिन 2026 की ‘इनसाइड स्टोरी’ बताती है कि ‘शिक्षा माफिया’ ने 2024 की गलतियों से सीखा, पर सिस्टम ने नहीं।

टेलीग्राम और डार्क वेब: इस बार पेपर लीक की तकनीक और भी शातिर थी। जांच में सामने आया है कि परीक्षा से 24 घंटे पहले ही ‘सॉल्वर गैंग’ के पास पेपर पहुंच चुका था और इसे टेलीग्राम के सीक्रेट चैनल्स के जरिए लाखों रुपयों में बेचा गया।

मॉडस ऑपेरंडी: माफियाओं ने उन छोटे केंद्रों को निशाना बनाया जहां सुरक्षा के इंतजाम ढीले थे। डिजिटल प्रिंटिंग प्रेस से लेकर ट्रांसपोर्टेशन के दौरान जीपीएस ट्रैकिंग को जाम (Jam) करने तक की साजिश रची गई।

आखिर सिस्टम फेल क्यों हो रहा है?
एनटीए पर उठ रहे सवालों के बीच तीन प्रमुख कारण सामने आते हैं…

जवाबदेही का अभाव: 2024 के बड़े विवाद के बाद भी किसी बड़े अधिकारी पर गाज नहीं गिरी। जब जिम्मेदारी तय नहीं होती, तो लापरवाही को बढ़ावा मिलता है।
पुराना पैटर्न (Pen-Paper Mode): डिजिटल इंडिया के दौर में भी 30 लाख छात्रों का ऑफलाइन पेपर लेना जोखिम भरा है। करोड़ों ओएमआर शीट्स और प्रश्न पत्रों का परिवहन करना माफियाओं को मौका देता है।
कानून का डर नहीं: केंद्र सरकार ने ‘एंटी-पेपर लीक कानून’ (Public Examinations Act) तो पास कर दिया, लेकिन धरातल पर इसका खौफ नजर नहीं आता। जब तक अपराधियों को त्वरित और कठोर सजा नहीं मिलेगी, करोड़ों का यह काला धंधा चलता रहेगा।

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